अध्याय 13 दोलन
13.1 भूमिका
हम अपने दैनिक जीवन में विभिन्न प्रकार की गतियाँ देखते हैं। इनमें से कुछ जैसे सरल रैखिक गति और किसी प्रक्षेप्य की गति के विषय में तो आप अध्ययन कर ही चुके हैं। ये दोनों ही गतियाँ अनावर्ती होती हैं। हमने एकसमान वर्तुल गति तथा सौर परिवार में ग्रहों की कक्षीय गतियों के विषय में भी अध्ययन कर लिया है। इन उदाहरणों में निश्चित समय-अंतराल के पश्चात् गति की पुनरावृत्ति होती है, अर्थात् यह आवर्ती होती है। आपने बचपन में अपने पालने अथवा झूले पर झूलने का आनन्द लिया होगा। यह दोनों गतियाँ पुनरावर्ती होती हैं, परंतु किसी ग्रह की आवर्ती गति से भिन्न होती हैं। यहाँ वस्तु किसी माध्य स्थिति के इधर-उधर गति करती है । दीवार-घड़ी का लोलक भी इसी प्रकार की गति करता है। इस प्रकार की अग्र-पश्च (आगे-पीछे) आवर्ती गति के प्रचुर उदाहरण हैं- नदी में डूबती-उतरती हुई नाव, वाष्प इंजन में अग्र और पश्च चलता हुआ पिस्टन आदि। इस प्रकार की गति को दोलन गति कहते हैं। इस अध्याय में हम इस गति के बारे में अध्ययन करेंगे ।
दोलन गति का अध्ययन भौतिकी के लिए आधारभूत है; बहुत-सी भौतिक परिघटनाओं को समझने के लिए इसकी संकल्पना की आवश्यकता होती है । वाद्य यंत्रों; जैसे-सितार, गिटार अथवा वायलिन में हम कंपायमान डोरियों द्वारा रोचक ध्वनियाँ उत्पन्न होते हुए देखते हैं। ढोलों में झिल्लियाँ तथा टेलीफोन और ध्वनि विस्तारकों के स्पीकरों में डायफ्राम अपनी माध्य स्थिति के इधर-उधर कंपन करते हैं। वायु के अणुओं के कंपनों द्वारा ही ध्वनि-संचरण संभव हो पाता है। एक ठोस पदार्थ में अणु अपनी माध्य स्थितियों के परितः कम्पन करते हैं, कम्पन की औसत ऊर्जा तापमान के समानुपाती होती है।
किसी आवर्ती गति के व्यापक तथा दोलन गति के विशेष विवरण के लिए कुछ मूल संकल्पनाओं; जैसे-आवर्तकाल, आवृत्ति, विस्थापन, आयाम और कला की आवश्यकता होती है । अगले अनुभाग में इन संकल्पनाओं को विकसित किया गया है ।
13.2 दोलन और आवर्ती गति
चित्र 13.1 में कुछ आवर्ती गतियाँ दर्शाई गई हैं। मान लीजिए कोई कीट किसी रैम्प पर चढ़ता है और गिर जाता है। वह अपने प्रारंभिक स्थान पर आ जाता है और इस प्रक्रिया को बार-बार दोहराता है। यदि आप जमीन से ऊपर इसकी ऊँचाई तथा समय के बीच ग्राफ खींचें तो यह चित्र 13.1(a) की तरह दिखेगा। यदि कोई बालक किसी सीढ़ी पर चढ़े और उतरे तथा इस प्रक्रिया को समान रूप से बार-बार दोहराये तो उसकी ऊँचाई तथा समय के बीच ग्राफ चित्र 13.1(b) के जैसा दिखेगा। जब आप किसी गेंद को अपनी हथेली से जमीन की तरफ बार-बार मारते हैं तो इसकी ऊँचाई और समय के बीच ग्राफ 13.1(c) के जैसा दिखेगा। ध्यान दीजिए कि चित्र 13.1(c) में दोनों वक्रीय भाग न्यूटन की गति समीकरण के अनुसार परवलय के अंश हैं, अनुभाग (2.6) देखिए।
इन समीकरणों में
चित्र 13.1 आवृत्ति गति के उदाहरण। प्रत्येक अवस्था में आवर्तकाल
दोलन एवं कंपन में कोई मुख्य अंतर नहीं है। साधारणतः जब आवृत्ति का मान कम होता है तो हम गति को दोलनीय कहते हैं (जैसे किसी वृक्ष की टहनी की दोलन गति)। इसके विपरीत जब गति की आवृत्ति अधिक होती है तो हम गति को कंपन कहते हैं। जैसे किसी संगीत वाद्य के तार का कंपन।
सरल आवर्ती गति दोलनीय गति का एक सरल रूप है। यह तब होता है जब किसी दोलनीय वस्तु के ऊपर लगने वाला बल संतुलन अवस्था में इसके विस्थापन के समानुपाती होता है। पुनः वस्तु के दोलन के दौरान यह बल सदैव इस संतुलन अवस्था की तरफ निदेशित होता है। यह संतुलन अवस्था वस्तु की गति की माध्य स्थिति भी होती है।
व्यावहारिक रूप में सभी दोलनीय वस्तुएँ अंततोगत्वा अपनी संतुलन अवस्था को प्राप्त कर लेती हैं। क्योंकि इनकी गति में घर्षण तथा अन्य क्षयकारी बलों के कारण अवमंदन उत्पन्न होता है। परंतु कोई बाह्य आवर्ती बल लगाकर हम वस्तु को दोलनीय अवस्था में रख सकते हैं। इस पाठ के अंतिम अनुभागों में हम अवमंदित तथा प्रणोदित दोलनों का अध्ययन करेंगे।
किसी भी द्रव्यात्मक माध्यम को हम युग्मित दलित्रों का एक बड़ा समूह मान सकते हैं। इन दलित्रों के सामूहिक दोलन तरंग का रूप लेते हैं। जल तरंग, भूकम्पित तरंगें, विद्युत चुंबकीय तरंगें इन तरंगों के उदाहरण हैं। तरंगीय घटनाओं के विषय में हम अगले अध्याय में अध्ययन करेंगे।
13.2.1 आवर्तकाल तथा आवृत्ति
हमने देखा है कि कोई गति जिसकी किसी नियमित समय अंतराल पर स्वयं पुनरावृत्ति होती है आवर्ती गति कहलाती है। वह न्यूनतम समय अंतराल जिसके पश्चात् गति की पुनरावृत्ति होती है, इसका आवर्तकाल कहलाता है। अतः समय को हम
आवर्तकाल ’
इस प्रकार
1 हर्ट्ज़
ध्यान दीजिए, आवृत्ति का सदैव ही पूर्णांक होना आवश्यक
13.2.2 विस्थापन
अनुभाग 3.2 में हमने किसी कण के विस्थापन को उसके स्थिति सदिश में परिवर्तन के रूप में परिभाषित किया था। इस अध्याय में हम विस्थापन नामक इस पद का उपयोग अधिक व्यापक अर्थों में करेंगे । यह किसी भी विचारणीय भौतिक गुण में समय के साथ परिवर्तन को निरूपित करेगा । उदाहरण के लिए, एक पृष्ठ पर किसी स्टील बॉल की सरल रेखीय गति के लिए, समय के फलन के रूप में आरंभ बिंदु से बॉल की दूरी इसका स्थिति-विस्थापन है । मूल बिंदु का चुनाव सुविधानुसार किया जा सकता है । मान लीजिए कोई गुटका किसी कमानी से जुड़ा है जिसका दूसरा सिरा किसी दृढ़ दीवार से संबद्ध है [देखिए चित्र 13.2 (a)] साधारणतः किसी पिण्ड का विस्थापन इसकी संतुलन अवस्था से मापना सरल होगा। किसी दोलायमान
चित्र 13.2(a) कोई गुटका किसी कमानी से संलग्न, जिसका दूसरा सिरा किसी दृढ़ दीवार से संबद्ध है । गुटका घर्षण रहित पृष्ठ पर गति करता है। गुटके की गति को दीवार से दूरी, अथवा विस्थापन
चित्र
सरल लोलक के लिए, समय के फलन के रूप में ऊर्ध्वाधर से कोण को विस्थापन-चर के रूप में निरूपित किया जा सकता है [देखिए चित्र 13.2(b)]। ‘विस्थापन’ पद का उल्लेख सदैव स्थिति के संदर्भ में ही नहीं किया जाता। विस्थापन चर कई अन्य प्रकार के भी हो सकते हैं । किसी a.c. परिपथ में संयोजित संधारित्र के सिरों के बीच समय के साथ परिवर्तित हो रही “वोल्टता” को भी एक विस्थापन चर के रूप में लिया जा सकता है । इसी प्रकार, ध्वनि तरंगों के संचरण में समय के साथ ‘दाब’ में परिवर्तन, प्रकाश तरंगों में परिवर्तित हो रहे वैद्युत तथा चुंबकीय क्षेत्र अन्य संदर्भो में विस्थापन के उदाहरण हैं। विस्थापन चर का मान धनात्मक या ऋणात्मक हो सकता है। दोलनों के प्रयोगों में, भिन्न समयों के लिए विस्थापन चरों की माप ली जाती है ।
विस्थापन को सदैव ही समय के गणितीय फलन द्वारा निरूपित किया जा सकता है । आवर्ती गतियों में यह फलन समय का आवर्ती होता है । आवर्ती फलनों में से एक सरलतम आवर्ती फलन को निम्न प्रकार से व्यक्त कर सकते हैं,
यदि इस फलन के कोणांक,
अतः कोई फलन
यदि हम ज्या
भी आवर्ती फलन होता है, जिसका आवर्तकाल
लें, तो समीकरण (13.3c) को इस प्रकार लिख सकते हैं
यहाँ अचर
आवर्ती ज्या और कोज्या फलनों का विशेष महत्त्व फ्रांसीसी गणितज्ञ जीन बापटिस्ट जोसेफ फूरिए (1768-1830) द्वारा सिद्ध असाधारण परिणाम के कारण है, जो इस प्रकार है : किसी भी आवर्ती फलन को उचित गुणांक वाले विभिन्न आवर्तकाल के ज्या व कोज्या फलनों के अध्यारोपण द्वारा व्यक्त किया जा सकता है ।
13.3 सरल आवर्त गति
हम चित्र 13.3 के अनुसार
चित्र
आवर्त गति कहते हैं, यदि मूल बिन्दु से कण का विस्थापन
यहाँ
चित्र 13.4 सरल आवर्त गति करते हुए समय के असतत मान
समय के असतत् मानों पर स्थिति दर्शायी गई है। प्रत्येक समय अन्तराल
चित्र 13.5 सरल आवर्त गति करते हुए कण का विस्थापन समय के सतत फलन के रूप में
चित्र 13.5 में
चित्र 13.6 समीकरण (13.4) में दिए मानक संकेतों का अर्थ
हैं, के मानक नाम हैं, जैसा कि चित्र 13.6 में संक्षिप्त किया गया है। आइए, इन राशियों को हम समझें।
SHM का आयाम
चित्र 13.7 (a) समीकरण (13.4) से प्राप्त
जब किसी दिए गए आवर्त गति का आयाम
चित्र 13.7(b) समीकरण (13.4) से प्राप्त
अंततः राशि
चूंकि गति का आवर्तकाल
अब चूँकि
अर्थात्
चित्र 13.8 समीकरण (14.4) के
13.4 सरल आवर्त गति तथा एकसमान वर्तुल गति
इस अनुभाग में हम देखेंगे कि वृत्त के व्यास पर एकसमान वर्तुल गति का प्रक्षेप सरल आवर्त गति करता है। एक सरल प्रयोग (चित्र 13.9) इस संबंध की सजीव कल्पना करने में हमारी मदद करता है। एक गेंद को किसी डोरी के सिरे से बाँधकर क्षैतिज तल में उसे किसी निश्चित बिंदु के परितः अचर कोणीय चाल से गति कराइये। तब गेंद क्षैतिज तल में एकसमान वर्तुल गति करेगी। अपनी आंख को गति के तल पर केन्द्रित रखते हुए तिरछी ओर से अथवा सामने से गेंद का अवलोकन कीजिए। घूर्णन बिन्दु को यदि हम मध्य बिन्दु मानें तो यह गेंद एक क्षैतिज तल के अनुदिश इधर-उधर गति करती हुई प्रतीत होगी। विकल्पतः आप गेंद की परछार्ई वृत्त के तल के लंबवत् किसी दीवार पर भी देख सकते हैं। इस प्रक्रिया में हम जो कुछ अवलोकन करते हैं, वास्तव में वह हमारी दृष्टि की दिशा के अभिलंबवत् व्यास पर बॉल की गति होती है।
चित्र 13.9 किनारे से देखे गए एक समतल में बॉल की वृत्तीय गति सरल आवर्त गति है।
चित्र 13.10 इसी स्थिति को गणितीय रूप में वर्णन करता है। मान लीजिए कोई कण
चित्र 13.10
जो कि SHM का पारिभाषिक समीकरण है। यह दर्शाता है कि यदि
यह भी एक SHM है जिसका आयाम
वर्तुल गति तथा SHM के बीच इस संबंध के बावजूद रैखिक सरल आवर्ती गति में किसी कण पर लगता हुआ बल किसी कण को एकसमान वर्तुल गति में रखने के लिए आवश्यक अभिकेन्द्रीय बल से काफी अलग है।
- कोण की प्राकृतिक इकाई रेडियन है जिसे त्रिज्या की चाप के अनुपात द्वारा परिभाषित करते हैं। कोण अदिश राशि है। जब हम
को उसके बहुगुण या अपवर्तक लिखते हैं तो रेडियन इकाई का उल्लेख करना आवश्यक नहीं है। रेडियन और डिग्री के बीच रूपांतरण, मीटर, सेंटीमीटर या मील के बीच रूपांतरण के समरूप नहीं है। यदि किसी त्रिकोणमितीय फलन के कोणांक में इकाई नहीं दिया है तो मानना चाहिए कि इकाई रेडियन है। यदि कोण की इकाई डिग्री है तो उसको स्पष्टतः दर्शाना होगा। उदाहरण के लिए का अर्थ है 15 डिग्री का । परन्तु का तात्पर्य 15 रेडियन का है। आगे से ‘rad’ इकाई नहीं दर्शाया जाएगा। जब भी कोण का अंकिक मान बिना इकाई के दिया हुआ है तो इकाई वास्तव में रेडियन है।
13.5 सरल आवर्त गति में वेग तथा त्वरण
एकसमानीय वर्तुल गति करते हुए किसी कण की चाल इसकी कोणीय चाल गुणा वृत्त की त्रिज्या
किसी समय
चित्र 13.11 कण
सरल आवर्त गति करते हुए कण के तात्क्षणिक त्वरण को प्राप्त करने के लिए संदर्भ वृत्त की विधि को इसी प्रकार प्रयोग में लाया जा सकता है।
हमें ज्ञात है कि एकसमानीय वर्तुल गति में कण के अभिकेन्द्रीय त्वरण का परिमाण
चित्र 13.12 बिंदु
समीकरण (13.11) सरल आवर्त गति करते हुए कण का त्वरण व्यक्त करता है। इसी समीकरण को, समीकरण (13.9) से प्रदत्त वेग
समीकरण (13.11) से हम एक महत्त्वपूर्ण परिणाम पर ध्यान देते हैं कि सरल आवर्त गति में कण का त्वरण इसके विस्थापन के अनुक्रमानुपाती होता है।
बीच
सरलता के लिए हम
चित्र 13.13 सरल आवर्त गति में किसी कण का विस्थापन, वेग तथा त्वरण का आवर्तकाल
13.6 सरल आवर्त गति के लिए बल का नियम
न्यूटन की गति के दूसरे नियम तथा आवर्त गति करते किसी कण के लिए त्वरण के व्यंजक (समीकरण 13.11) प्रयोग करने पर
त्वरण की तरह, बल हमेशा माध्य स्थिति की ओर निर्दिष्ट रहता है - इसलिए यह सरल आवर्त गति में प्रत्यानयन बल कहलाता है। अब तक की गई चर्चाओं को संक्षिप्त करने पर हम पाते हैं कि सरल आवर्त गति को दो प्रकार से परिभाषित किया जा सकता है, या तो विस्थापन के लिए समीकरण (13.4) द्वारा अथवा समीकरण (13.13) द्वारा जो कि बल के नियम प्रदान करता है। समीकरण (13.4) से समीकरण (13.13) प्राप्त करने के लिए हमें इसे दो बार अवकलित करना पड़ा। इसी प्रकार बल के नियम, समीकरण (13.13) को दो बार समाकलित करने पर हमें वापस समीकरण (13.4) प्राप्त हो सकता है।
ध्यान दीजिए कि समीकरण (13.13) में बल
13.7 सरल आवर्त गति में ऊर्जा
सरल आवर्त गति करते हुए कण की स्थितिज तथा गतिज ऊर्जाएँ दोनों शून्य तथा अपने अधिकतम परिमाण के बीच विचरण करती हैं।
अनुभाग 13.5 में हमने देखा है कि सरल आवर्त गति करते किसी कण का वेग समय का आवर्ती फलन होता है। विस्थापन की चरम स्थितियों में यह शून्य होता है । अतः ऐसे कण की गतिज ऊर्जा (K), जिसे हम इस प्रकार परिभाषित करते हैं,
भी समय का आवर्ती फलन होती है जिसका परिमाण विस्थापन अधिकतम होने पर शून्य तथा कण के माध्य स्थिति पर होने पर अधिकतम होता है । ध्यान दीजिए, चूँकि गतिज ऊर्जा
सरल आवर्त गति करने वाले किसी कण की स्थितिज ऊर्जा कितनी होती है ? अध्याय 5 में हमने देखा है कि स्थितिज ऊर्जा की संकल्पना केवल संरक्षी बलों के लिए ही होती है । कमानी बल
अतः सरल आवर्त गति करते किसी कण की स्थितिज ऊर्जा,
इस प्रकार, सरल आवर्त गति करते किसी कण की स्थितिज ऊर्जा भी आवर्ती होती है जिसका आवर्तकाल
त्रिकोणमिती की सामान्य तादात्मक को प्रयोग करने पर कोष्ठक में दी गई राशि का मान एक प्राप्त होता है। अत:
जैसा कि संरक्षी बलों के अधीन गतियों के लिए आशा की जाती है किसी भी सरल आवर्ती दोलक की कुल यांत्रिक ऊर्जा कालाश्रित नहीं होती । किसी रैखिक सरल आवर्ती दोलक की गतिज तथा स्थितिज ऊर्जाओं की समय और विस्थापन पर निर्भरता चित्र 13.16 में दर्शायी गई है ।
(a)
(b)
चित्र 13.16 गतिज ऊर्जा, स्थितिज ऊर्जा तथा कुल ऊर्जा समय के फलन के रूप में [(a) में दर्शित] तथा सरल आवर्त गति करते हुए कण का विस्थापन [(b) में दर्शित]। गतिज ऊर्जा तथा स्थितिज ऊर्जा दोनों आवर्तकाल
ध्यान दीजिए कि सरल आवर्त गति में स्थितिज तथा गतिज दोनों ऊर्जाएँ चित्र 13.16 में हमेशा धनात्मक मानी गई हैं। निस्सन्देह गतिज ऊर्जा कभी ऋणात्मक नहीं हो सकती, क्योंकि यह चाल के वर्ग के समानुपाती होती है। स्थितिज ऊर्जा के
समीकरण में गुप्त नियतांक के चयन के कारण स्थितिज ऊर्जा धनात्मक होती है। गतिज तथा स्थितिज दोनों ऊर्जाएँ SHM के प्रत्येक आवर्तकाल में दो बार अपनी चरम स्थिति को प्राप्त करती हैं।
13.8 सरल आवर्त गति निष्पादित करने वाले कुछ निकाय
निरपेक्षतः शुद्ध सरल आवर्त गति के कोई भौतिक उदाहरण नहीं हैं । अपने व्यावहारिक जीवन में हम ऐसे निकाय देखते हैं जो किन्ही निश्चित परिस्थितियों में लगभग सरल आवर्त गति करते हैं। इस अनुभाग में इसके पश्चात् हम ऐसे ही कुछ निकायों की गतियों की चर्चा करेंगे ।
13.8.1 सरल लोलक
यह कहा जाता है कि गैलीलियो ने किसी चर्च में एक दोलायमान झाड़फानूस का आवर्तकाल अपनी नाड़ी की स्पंद गति द्वारा मापा था । उसने यह निष्कर्ष निकाला कि झाड़फानूस की गति आवर्ती है। यह निकाय लोलक का ही एक प्रकार होता है । लगभग 1 मीटर लंबे न खिंचने वाले धागे को लेकर उसके एक सिरे से पत्थर का टुकड़ा बाँधकर आप भी अपना एक लोलक बना सकते हैं। अपने लोलक को किसी उचित टेक से बाँधकर इस प्रकार लटकाइए कि वह स्वतंत्रतापूर्वक दोलन कर सके । पत्थर के टुकड़े को कम दूरी तक विस्थापित करके छोड़ दीजिए । पत्थर इधर-उधर गति करने लगता है। पत्थर की यह गति आवर्ती होती है जिसका आवर्तकाल लगभग 2 सेकंड होता है।
हम यह स्थापित करेंगे कि मध्यमान स्थिति से लघु विस्थापनों के लिए इस लोलक की आवर्त गति सरल आवर्त गति होती है। किसी ऐसे सरल लोलक पर विचार कीजिए जिसमें
(a)
चित्र 13.17 (a) माध्य स्थिति के सापेक्ष दोलन करता कोई सरल लोलक, (b) त्रिज्य बल
माना कि डोरी ऊर्ध्वाधर से
गोलक पर केवल दो बल कार्यरत हैं : डोरी की लंबाई के अनुदिश तनाव
यह एक प्रत्यानयन बल आघूर्ण है जो विस्थापन के परिणाम को कम करने का प्रयास करता है; इसी कारण इसे ॠणात्मक चिह्न द्वारा व्यक्त किया गया है। घूर्णी गति के लिए न्यूटन के नियम के अनुसार
यहाँ
अथवा
यदि हम यह मानें कि विस्थापन
यहाँ
अब यदि
सारणी 13.1 में हमने कोण
सारणी
0 | 0 | 0 |
5 | 0.087 | 0.087 |
10 | 0.174 | 0.174 |
15 | 0.262 | 0.259 |
20 | 0.349 | 0.342 |
गणितीय रूप में समीकरण (13.24) समीकरण (13.11) के तुल्य है, अंतर केवल यह है कि यहाँ चर राशि कोणीय त्वरण है। अतः हमने यह सिद्ध कर दिया है कि
समीकरण (13.24) तथा समीकरण (13.11) से हम यह देखते हैं कि
तथा लोलक का आवर्तकाल
अब क्योंकि लोलक की डोरी द्रव्यहीन है, अतः जड़त्व आघूर्ण
सारांश
1. वह गति जो स्वयं को दोहराती है आवर्ती गति कहलाती है,
2. एक दोलन अथवा चक्र को पूरा करने के लिए आवश्यक समय
किसी आवर्ती अथवा दोलनी गति की आवृत्ति उसके द्वारा 1 सेकंड में पूरे किए गए दोलनों की संख्या होती है । SI मात्रक पद्धति में इसे हर्ट्ज़ में मापा जाता है;
3. सरल आवर्त गति में, किसी कण का उसकी साम्यावस्था की स्थिति से विस्थापन
यहाँ
4. सरल आवर्त गति, एकसमान वर्तुल गति के उस वृत्त के व्यास पर प्रक्षेप होती है, जिस पर गति हो रही है ।
5. सरल आवर्त गति के समय कण के वेग तथा त्वरण को समय
समयकालिक क्रिया और सरल आवर्त गति द्वारा हम वेग और गति को इस प्रकार देख सकते हैं।
6. सरल आवर्त गति किसी कण की वह गति होती है जिसमें उस कण पर कोई ऐसा बल आरोपित रहता है, जो कण के विस्थापन के अनुक्रमानुपाती, तथा सदैव गति के केंद्र की ओर निर्दिष्ट होता है ।
7. सरल आवर्त गति करते किसी कण में, किसी भी क्षण, गतिज ऊर्जा
8.
भौतिक राशि | प्रतीक | विमाएँ | मात्रक | टिप्पणी |
---|---|---|---|---|
आवर्तकाल | गति की स्वयं पुनरावृत्ति के लिए न्यूनतम समय |
|||
आवृत्ति | ||||
कोणीय आवृत्ति | ||||
कला नियतांक | विमाहीन | रेडियन | सरल आवर्त गति में विस्थापन की कला का आरंभिक मान |
|
बल नियतांक | सरल आवर्त गति में |
सरल आवर्त गति दर्शाता है जिसके लिए,
ऐसे निकाय को रैखिक दोलक भी कहते हैं ।
9. लघु कोणों में दोलन करते सरल लोलक की गति सन्निकट सरल आवर्त गति होती है । इसका आवर्तकाल,
विचारणीय विषय
1. आवर्तकाल
2. प्रत्येक आवर्ती गति सरल आवर्त गति नहीं होती। केवल वही आवर्ती गति जो बल-नियम
3. वर्तुल गति व्युत्क्रम-वर्ग नियम बल (जैसे ग्रहीय गति में) तथा द्विविमा में सरल आवर्त बल
4.
5. उपरोक्त बिंदु (4) से, दिए गए आयाम अथवा ऊर्जा गति की कला का निर्धारण आरंभिक स्थिति अथवा आरंभिक वेग द्वारा किया जाता है।
6. यादृच्छिक आयामों तथा कलाओं वाली दो सरल आवर्त गतियों का संयोजन व्यापक रूप में आवर्ती नहीं होता। यह केवल तभी आवर्ती होता है जब एक गति की आवृत्ति दूसरी गति की आवृत्ति की पूर्णांक गुणज हो। तथापि, किसी आवर्ती गति को सदैव ही उपयुक्त आयामों की अनंत सरल आवर्त गतियों के रूप में व्यक्त किया जा सकता है।
7. सरल आवर्त गति का आवर्तकाल आयाम अथवा ऊर्जा अथवा कला नियतांक पर निर्भर नहीं करता। गुरुत्वाकर्षण के अधीन ग्रहीय कक्षों के आवर्तकाल इसके विपरीत हैं (केप्लर का तृतीय नियम)।
8. किसी सरल लोलक की गति लघु कोणीय विस्थापन के लिए ही सरल आवर्त गति होती है।
9. किसी कण की गति यदि सरल आवर्त गति है, तो उसके विस्थापन को निम्न रूपों में से किसी एक रूप में व्यक्त किया जाना चाहिए :
ये तीनों रूप पूर्णतः समतुल्य हैं (किसी भी एक रूप को अन्य दो रूपों के पदों में व्यक्त किया जा सकता है।)