साम्यावस्था EQUILIBRIUM
अनेक जैविक एवं पर्यावरणीय प्रक्रियाओं में रासायनिक साम्य महत्त्वपूर्ण है। उदाहरणार्थ- हमारे फेफड़ों से मांसपेशियों तक
जब किसी बंद पात्र में एक द्रव वाष्पित होता है, तो उच्च गतिज ऊर्जा वाले अणु द्रव की सतह से वाष्प प्रावस्था में चले जाते हैं तथा अनेक जल के अणु द्रव की सतह से टकराकर वाष्प प्रावस्था से द्रव प्रावस्था में समाहित हो जाते हैं। इस प्रकार द्रव एवं वाष्प के मध्य एक गतिज साम्य स्थापित हो जाता है, जिसके परिणामस्वरूप द्रव की सतह पर एक निश्चित वाष्प-दाब उत्पन्न होता है। जब जल का वाष्पन प्रारंभ हो जाता है, तब जल का वाष्प-दाब बढ़ने लगता है और अंत में स्थिर हो जाता है। ऐसी स्थिति में हम कहते हैं कि निकाय (System) में साम्यावस्था स्थापित हो गई है। यद्यपि यह साम्य स्थैतिक नहीं है तथा द्रव की सतह पर द्रव एवं वाष्प के बीच अनेक क्रियाकलाप होते रहते हैं। इस प्रकार साम्यावस्था पर वाष्पन की दर संघनन-दर के बराबर हो जाती है। इसे इस प्रकार दर्शाया जाता है
यहाँ दो अर्ध तीर इस बात को दर्शाते हैं कि दोनों दिशाओं में प्रक्रियाएँ साथ-साथ होती हैं तथा अभिक्रियकों एवं उत्पादों के साम्यावस्था पर मिश्रण को ‘साम्य मिश्रण’ कहते हैं। भौतिक प्रक्रमों तथा रासायनिक अभिक्रियाओं दोनों में साम्यावस्था स्थापित हो सकती है। अभिक्रिया का तीव्र अथवा मंद होना उसकी प्रकृति एवं प्रायोगिक परिस्थितियों पर निर्भर करता है। जब स्थिर ताप पर एक बंद पात्र में अभिक्रियक क्रिया कर के उत्पाद बनाते हैं, तो उनकी सांद्रता धीरे-धीरे कम होती जाती है तथा उत्पादों की सांद्रता बढ़ती रहती है। किंतु कुछ समय पश्चात् न तो अभिक्रियकों के सांद्रण में और न ही उत्पादों के सांद्रण में कोई परिवर्तन होता है। ऐसी स्थिति में निकाय में गतिक साम्य (Dynamic Equilibrium) स्थापित हो जाता है तथा अग्र एवं पश्चगामी अभिक्रियाओं की दरें समान हो जाती हैं। इसी कारण इस अवस्था में अभिक्रिया-मिश्रण में उपस्थित विभिन्न घटकों के सांद्रण में कोई परिवर्तन नहीं
होता है। इस आधार पर कि साम्यावस्था पहुँचने तक कितनी अभिक्रिया पूर्ण हो चुकी है, समस्त रासायनिक अभिक्रियाओं को निम्नलिखित तीन समूहों में वर्गीकृत किया जाता है-
(i) प्रथम समूह में वे अभिक्रियाएँ आती हैं, जो लगभग पूर्ण हो जाती हैं तथा अभिक्रियकों की सांद्रता नगण्य रह जाती है। कुछ अभिक्रियाओं में तो अभिक्रियकों की सांद्रता इतनी कम हो जाती है कि उनका परीक्षण प्रयोग द्वारा संभव नहीं हो पाता है।
(ii) द्वितीय समूह में वे अभिक्रियाएँ आती हैं, जिनमें बहुत कम मात्रा में उत्पाद बनते हैं तथा साम्यावस्था पर अभिक्रियकों का अधिकतर भाग अपरिवर्तित रह जाता है।
(iii) तृतीय समूह में उन अभिक्रियाओं को रखा गया है, जिनमें अभिक्रियकों एवं उत्पादों की सांद्रता साम्यावस्था में तुलना योग्य हो।
साम्यावस्था पर अभिक्रिया किस सीमा तक पूर्ण होती है यह उसकी प्रायोगिक परिस्थितियों जैसे-अभिक्रियकों की सांद्रता, ताप आदि) पर निर्भर करती है। उद्योग तथा प्रयोगशाला में परिचालन परिस्थितियों (Operational Conditions) का इष्टतमीकरण (Optimize) करना बहुत महत्त्वपूर्ण होता है, ताकि साम्यावस्था का झुकाव इच्छित उत्पाद की दिशा में हो। इस एकक में हम भौतिक तथा रासायनिक प्रक्रमों में साम्य के कुछ महत्त्वपूर्ण पहलुओं के साथ-साथ जलीय विलयन में आयनों के साम्य, जिसे आयनिक साम्य कहते हैं, को भी सम्मिलित करेंगे।
6.1 भौतिक प्रक्रमों में साम्यावस्था
भौतिक प्रक्रमों के अध्ययन द्वारा साम्यावस्था में किसी निकाय के अभिलक्षणों को अच्छी तरह समझा जा सकता है। प्रावस्था रूपांतरण प्रक्रम (Phase Transformation Processes) इसके सुविदित उदाहरण हैं। उदाहरणार्थ-
6.1.1 ठोस-द्रव साम्यावस्था
पूर्णरूपेण रोधी (Insulated) थर्मस फ्लास्क में रखी बर्फ़ एवं जल (यह मानते हुए कि फ्लास्क में रखे पदार्थ एवं परिवेश में ऊष्मा का विनिमय नहीं होता है
यह स्पष्ट है कि बर्फ एवं जल केवल किसी विशेष ताप एवं दाब पर ही साम्यावस्था में होते हैं। वायुमंडलीय दाब पर किसी शुद्ध पदार्थ के लिए वह ताप, जिसपर ठोस एवं द्रव प्रावस्थाएँ साम्यावस्था में होती हैं, पदार्थ का ‘मानक गलनांक’ या ‘मानक हिमांक’ कहलाता है। यह निकाय दाब के साथ केवल थोड़ा-सा ही परिवर्तित होता है। इस प्रकार यह निकाय गतिक साम्यावस्था में होता है। इससे निम्नलिखित निष्कर्ष प्राप्त होते हैं -
(i) दोनों विरोधी प्रक्रियाएँ साथ-साथ होती हैं।
(ii) दोनों प्रक्रियाएँ समान दर से होती हैं। इससे बर्फ़ एवं जल का द्रव्यमान स्थिर रहता है।
6.1.2 द्रव-वाष्प साम्यावस्था
इस तथ्य को निम्नलिखित प्रयोग के माध्यम से समझा जा सकता है। एक
निर्जल कैल्सियम क्लोराइड
चित्र 6.1: स्थिर ताप पर जल की साम्यावस्था का वाष्प-दाब मापन
इसका तात्पर्य यह है, कि जैसे-जैसे जल के अणुओं की संख्या गैसीय अवस्था में बढ़ने लगती है, वैसे-वैसे गैसीय अवस्था से जल के अणुओं की द्रव-अवस्था में संघनन की दर साम्यावस्था स्थापित होने तक बढ़ती रहती है। अर्थात-
सामयावस्था पर : वाष्पन की दर
साम्यावस्था में जल-अणुओं द्वारा उत्पत्र दाब किसी दिए ताप पर स्थिर रहता है, इसे जल का साम्य वाष्प दाब, (या जल का वाष्प-दाब) कहते हैं। द्रव का वाष्प-दाब ताप के साथ बढ़ता है। यदि यह प्रयोग मेथिल ऐल्कोहॉल, ऐसीटोन तथा ईथर के साथ दोहराया जाए, तो यह प्रेक्षित होता है कि इनके साम्य वाष्प-दाब विभिन्न होते हैं। अपेक्षाकृत उच्च वाष्प दाब वाला द्रव अधिक वाष्पशील होता है एवं उसका क्वथानांक कम होता है।
यदि तीन वाच-ग्लासों में ऐसीटोन, एथिल ऐल्कोहॉल एवं जल में प्रत्येक का
बंद पात्र में जल एवं जल-वाष्प एक वायुमंडलीय दाब (1.013 bar) तथा
6.1.3 ठोस-वाष्प साम्यावस्था
अब हम ऐसे निकायों पर विचार करेंगे, जहाँ ठोस वाष्प अवस्था में ऊर्ध्वपातित होते हैं। यदि हम आयोडीन को एक बंद पात्र में रखें, तो कुछ समय पश्चात् पात्र बैगनी वाष्प से भर जाता है तथा समय के साथ-साथ रंग की तीव्रता में वृद्धि होती है। परंतु कुछ समय पश्चात् रंग की तीव्रता स्थिर हो जाती है। इस स्थिति में साम्यावस्था स्थापित हो जाती है। अतः ठोस आयोडीन ऊर्ध्वपातित होकर आयोडीन वाष्प देती है तथा साम्यावस्था को इस रूप में दर्शाया जा सकता है -
6.1.4 द्रव में ठोस अथवा गैस की घुलनशीलता- संबंधी साम्य
द्रवों में ठोस
हम अपने अनुभव से यह जानते हैं कि दिए गए जल की एक निश्चित मात्रा में सामान्य ताप पर लवण या चीनी की एक सीमित मात्रा ही घुलती है। यदि हम उच्च ताप पर चीनी की चाशनी बनाएं और उसे ठंडा करें, तो चीनी के क्रिस्टल पृथक् हो जाएंगे। किसी ताप पर दिए गए विलयन में यदि और अधिक विलेय न घुल सके, तो ऐसे विलयन को ‘संतृप्त विलयन, (Saturated) कहते हैं। विलेय की विलेयता ताप पर निर्भर करती है। संतृप्त विलयन में अणुओं की ठोस अवस्था एवं विलेय के विलयन में अणुओं के बीच गतिक साम्यावस्था रहती है।
चीनी (विलयन)
तथा साम्यावस्था में,
चीनी के घुलने की दर
रेडियोऐक्टिवतायुक्त चीनी की सहायता से उपरोक्त दरों एवं साम्यावस्था की गतिक प्रकृति को सिद्ध किया गया है। यदि हम रेडियोएक्टिवताहीन (Non-radioactive) चीनी के संतृप्त विलयन में रेडियेक्टिवता युक्त चीनी की कुछ मात्रा डाल दें, तो कुछ समय बाद हमें दोनों विलयन एवं ठोस चीनी, जिसमें प्रारंभ में रेडियोऐक्टिवता युक्त चीनी के अणु नहीं थे, किंतु साम्यावस्था की गतिक प्रकृति के कारण रेडियोऐक्टिवतायुक्त एवं रेडियोऐक्टिवताहीन चीनी के अणुओं का विनियम दोनों प्रावस्थाओं में होता है। इसलिए रेडियोऐक्टिव एवं रेडियोऐक्टिवतायुक्त चीनी अणुओं का अनुपात तब तक बढ़ता रहता है, जब तक यह एक स्थिर मान तक नहीं पहुँच जाता।
द्रवों में गैसें
जब सोडा-वाटर की बोतल खोली जाती है, तब उसमें घुली हुई कार्बन डाइऑक्साइड गैस की कुछ मात्रा तेजी से बाहर निकलने लगती है। भिन्न दाब पर जल में कार्बन डाइऑक्साइड की भिन्न विलेयता के कारण ऐसा होता है। स्थिर ताप एवं दाब पर गैस के अविलेय अणुओं एवं द्रव में घुले अणुओं के बीच साम्यावस्था स्थापित रहती है। उदाहरणार्थ-
यह साम्यावस्था हेनरी के नियमानुसार है। जिसके अनुसार, “किसी ताप पर दी एक गई मात्रा के विलायक में घुली हुई गैस की मात्रा विलायक के ऊपर गैस के दाब के समानुपाती होती है।” ताप बढ़ने के साथ-साथ यह मात्रा घटती जाती है।
यह सामान्य रूप से कहा जा सकता है कि-
(i) ठोस 乞 द्रव, साम्यावस्था के लिए वायुमंडलीय दाब पर (1.013 bar) एक ही ताप (गलनांक) ऐसा होता है, जिसपर दोनों प्रावस्थाएँ पाई जाती हैं। यदि परिवेश से ऊष्मा का विनिमय न हो, तो दोनों प्रावस्थाओं के द्रव्यमान स्थिर होते हैं।
(i) वाष्प
(iii) द्रव में ठोस की घुलनशीलता के लिए किसी निश्चित ताप पर द्रव में ठोस की विलेयता निश्चित होती है।
(iv) द्रव में गैस की विलेयता द्रव के ऊपर गैस के दाब (सांद्रता) के समानुपाती होती है।
इन निष्कर्षों को सारणी 6.1 में दिया गया है -
सारणी 6.1 भौतिक साम्यावस्था की कुछ विशेषताएँ
प्रक्रम | निष्कर्ष |
---|---|
द्रव |
निश्चित ताप पर |
ठोस |
स्थिर दाब पर गलनांक निश्चित होता है। |
![]() |
विलयन में विलेय की सांद्रता निश्चित ताप पर स्थिर होती है। |
गैस |
[गैस |
6.1.5 भौतिक प्रक्रमों में साम्यावस्था के सामान्य अभिलक्षण
उपरोक्त भौतिक प्रक्रमों में सभी निकाय-साम्यावस्था के सामान्य अभिलक्षण निम्नलिखित हैं:
(i) निश्चित ताप पर केवल बंद निकाय (Closed System) में ही साम्यावस्था संभव है।
(ii) साम्यावस्था पर दोनों विरोधी अभिक्रियाएँ बराबर वेग से होती हैं। इनमें गतिक, किंतु स्थायी अवस्था होती है।
(iii) निकाय के सभी मापने योग्य गुण-धर्म स्थिर होते हैं।
(iv) जब किसी भौतिक प्रक्रम में साम्यावस्था स्थापित हो जाती है, तो सारणी 6.1 में वर्णित मापदंडों में से किसी एक का मान निश्चित ताप पर स्थिर होना वर्णित साम्यावस्था की पहचान है।
(v) किसी भी समय इन राशियों का मान यह दर्शाता है कि साम्यावस्था तक पहुँचने के पूर्व भौतिक प्रक्रम किस सीमा तक आगे बढ़ चुका है।
6.2 रासायनिक प्रक्रमों में साम्यावस्था-गतिक साम्य
यह पहले ही बताया जा चुका है कि बंद निकाय में की जाने वाली रासायनिक अभिक्रियाएँ अंततः साम्यावस्था की स्थिति में पहुँच जाती हैं। ये अभिक्रियाएँ भी अग्रिम तथा प्रतीप दिशाओं में संपन्न हो सकती हैं। जब अग्रिम एवं प्रतीप अभिक्रियाओं की दरें समान हो जाती हैं, तो अभिकारकों तथा उत्पादों की सांद्रताएँ स्थिर रहती हैं। यह रासायनिक साम्य की अवस्था है। यह गतिक साम्यावस्था अग्र अभिक्रिया (जिसमें अभिकारक उत्पाद में बदल जाते हैं) तथा प्रतीप अभिक्रिया (जिसमें उत्पाद मूल अभिकारक में बदल जाते हैं) से मिलकर उत्पत्र होती है। इसे समझने के लिए हम निम्नलिखित उत्क्रमणीय अभिक्रिया पर विचार करें (चित्र 6.2)-
समय बीतने के साथ अभिकारकों (
चित्र 6.2 : रासायनिक साम्यावस्था की प्राप्ति
हाबर-विधि द्वारा अमोनिया के संश्लेषण में रासायनिक साम्यावस्था की गतिक प्रकृति को दर्शाया जा सकता है। हाबर ने उच्च ताप तथा दाब पर डाइनाइट्रोजन तथा डाइहाइड्रोजन की विभिन्न ज्ञात मात्राओं के साथ अभिक्रिया कराकर नियमित अंतराल पर अमोनिया की मात्रा ज्ञात की। इसके आधार पर उन्होंने अभिक्रिया में शेष डाइनाइट्रोजन तथा डाइहाइड्रोजन की सांद्रता ज्ञात की। चित्र 6.4, (पेज 173) दर्शाता है कि एक निश्चित समय के बाद कुछ अभिकारकों के शेष रहने पर भी अमोनिया का सांद्रण एवं मिश्रण का संघटन वही बना रहता है। मिश्रण के संघटन की स्थिरता इस बात का संकेत देती है कि साम्यावस्था स्थापित हो गई है। अभिक्रिया की गतिक प्रकृति को समझने के लिए अमोनिया का संश्लेषण उन्हें करीब-करीब प्रारंभिक परिस्थितियों (उसी आंशिक दाब एवं ताप पर), किंतु
हालाँकि जब इस मिश्रण का विश्लेषण द्रव्यमान स्पेक्ट्रोमीटर (Mass Spectrometer) द्वारा किया जाता है, तो इसमें ड्यूटीरियमयुक्त विभिन्न अमोनिया अणु
अमोनिया के संश्लेषण में समस्थानिक (Deuterium) के प्रयोग से यह स्पष्ट होता है कि रासायनिक अभिक्रियाओं में गतिक साम्यावस्था स्थापित होने पर अग्रिम एवं प्रतीप अभिक्रियाओं की दर समान होती है तथा इसके मिश्रण के संघटन में कोई प्रभावी परिवर्तन नहीं होता है।
साम्यावस्था दोनों दिशाओं द्वारा स्थापित की जा सकती है, चाहे
गतिक साम्यावस्था-छात्रों के लिए एक प्रयोग
भौतिक या रासायनिक अभिक्रियाओं में साम्यावस्था की प्रकृति हमेशा गतिक होती है। रेडियोऐक्टिव समस्थानिकों के प्रयोग द्वारा इस तथ्य को प्रदर्शित किया जा सकता है। किंतु किसी विद्यालय की प्रयोगशाला में इसे प्रदर्शित करना संभव नहीं है। निम्नलिखित प्रयोग करके इस तथ्य को 5-6 विद्यार्थियों के समूह को आसानी से दिखाया जा सकता है -
यदि इन दो सिलिंडरों में रंगीन विलयन का स्थानांतरण एक से दूसरे में करते, तो इन सिलिंडरों में रंगीन जल के स्तर में अब कोई परिवर्तन नहीं होगा। यदि इन दो सिलिंडरों में रंगीन जल के स्तर को हम क्रमशः अभिकारकों एवं उत्पादों के सांद्रण के रूप में देखें तो हम कह सकते हैं कि यह प्रक्रिया इस प्रक्रिया की गतिक प्रकृति को इंगित करती है, जो रंगीन जल का स्तर स्थायी होने पर भी जारी रहती है। यदि हम इस प्रयोग को विभिन्न व्यासवाली दो नलियों की सहायता से दोहराएँ, तो हम देखंगे कि इन दो सिलिंडरों में रंगीन जल के स्तर भिन्न होंगे। इन दो सिलिंडरों में रंगीन जल के स्तर में अंतर भिन्न व्यास की नलियों के कारण होता है।
1
2
(क)
1
2
(ख)
चित्र 6.3 गतिक साम्यावस्था का प्रदर्शन (क) प्रारंभिक अवस्था (ख) अंतिम अवस्था
चित्र 6.4: अभिक्रिया
इसी प्रकार हम अभिक्रिया
चित्र 6.5:
यदि निश्चित आयतन में
6.3 रासायनिक साम्यावस्था का नियम तथा साम्यावस्था स्थिरांक
साम्यावस्था में अभिकारकों एवं उत्पादों के मिश्रण को ‘साम्य मिश्रण’ कहते हैं। एकक के इस भाग में साम्य मिश्रण के संघटन के संबंध में अनेक प्रश्नों पर हम विचार करेंगे। एक साम्य मिश्रण में अभिकारकों तथा उत्पादों की सांद्रताओं में क्या संबंध है? प्रारंभिक सांद्रताओं से साम्य सांद्रताओं को कैसे ज्ञात किया जा सकता है? साम्य मिश्रण के संघटन को कौन से कारक परिवर्तित कर सकते हैं? औद्योगिक दृष्टि से उपयोगी रसायन जैसे -
इन प्रश्नों के उत्तर के लिए हम निम्नलिखित सामान्य उत्क्रमणीय अभिक्रिया पर विचार करेंगे -
यहाँ इस संतुलित समीकरण में
यहाँ
गुलबर्ग तथा वाजे द्वारा प्रतिपादित सुझावों को अच्छी तरह समझने के लिए एक मुँहबंद पात्र (Sealed Vessel) में 731
पहले चार
सारणी 6.2 प्रारंभिक एवं साम्यावस्था पर
प्रयोग संख्या | आरम्भिक सांद्रता /mol L | साम्यवास्था पर सांद्रता /mol L | ||||
---|---|---|---|---|---|---|
1 | 0 | |||||
2 | 0 | |||||
3 | 0 | |||||
4 | 0 | |||||
5 | 0 | 0 | ||||
6 | 0 | 0 |
हाइड्रोजन एवं आयोडीन के भिन्न-भिन्न सांद्रण के साथ किया गया। कुछ समय बाद बंद पात्र में मिश्रण के रंग की तीव्रता स्थिर हो गई, अर्थात्-साम्यावस्था स्थापित हो गई। अन्य दो प्रयोग (सं. 5 एवं 6) केवल गैसीय
प्रयोग-संख्या
प्रयोग-संख्या 5 तथा 6 में हम देखते हैं कि-
साम्यावस्था पर अभिकारकों एवं उत्पादों की सांद्रता के बीच संबंध स्थापित करने के लिए हम कई संभावनाओं के विषय में सोच सकते हैं। नीचे दिए गए सामान्य व्यंजक पर हम विचार करें-
सारणी 6.3 अभिकर्मकों के साम्य सांद्रता-संबंधी व्यंजक
प्रयोग-संख्या | ||
---|---|---|
1 | 1840 | 46.4 |
2 | 1610 | 47.6 |
3 | 1400 | 46.7 |
4 | 1520 | 46.9 |
5 | 1970 | 46.4 |
6 | 790 | 46.4 |
सारणी 6.3 में दिए गए आँकड़ों की सहायता से यदि हम अभिकारकों एवं उत्पादों की साम्यावस्था-सांद्रता को उपरोक्त व्यंजक में रखें, तो उस व्यंजक का मान स्थिर नहीं, बल्कि भिन्न-भिन्न होगा (सारणी 6.3)। यदि हम निम्नलिखित व्यंजक लें-
तो हम पाएँगे कि सभी छः, प्रयोगों में यह व्यंजक स्थिर मान देता है (जैसा सारणी 6.3 में दिखाया गया है)। यह देखा जा सकता है कि इस व्यंजक में अभिकारकों एवं उत्पाद के सांद्रणों में घात (Power) का मान वही है, जो रासायनिक अभिक्रिया के समीकरण में लिखे उनके रससमीकरणमितीय गुणांक (Stoichiometric Coefficients) हैं। साम्यावस्था में इस व्यंजक के मान को ‘साम्यावस्था स्थिरांक’ कहा जाता है तथा इसे ’
ऊपर दिए गए व्यंजक, सांद्रता के पादांक के रूप में जो ’eq’ लिखा गया है, वह सामान्यतः नहीं लिखा जाता है, क्योंकि यह माना जाता है कि
पदांक ‘c’ इंगित करता है कि
दिए गए किसी ताप पर अभिक्रिया-उत्पादों की सांद्रता एवं अभिकारकों की सांद्रता के गुणनफल का अनुपात स्थिर रहता है। ऐसा करते समय सांद्रता व्यक्त करने के लिए संतुलित रासायनिक समीकरण में अभिकारकों एवं उत्पादों के रस समीकरणमितीय गुणांक को उनकी सांद्रता के घातांक के रूप में व्यक्त किया जाता है।
इस प्रकार एक सामान्य अभिक्रिया
अभिक्रिया उत्पाद (C या
विभिन्न अवयवों (Species) की मोलर-सांद्रता को उन्हें वर्गाकार कोष्ठक में रखकर दर्शाया जाता है तथा यह माना जाता है कि ये साम्यावस्था सांद्रताएँ हैं। जब तक बहुत आवश्यक न हो, तब तक साम्यावस्था स्थिरांक के व्यंजक में प्रावस्थाएँ (ठोस, द्रव या गैस) नहीं लिखी जाती हैं।
हम रससमीकरणमितीय अनुपात गुणांक बदल देते हैं, जैसे- यदि पूरे अभिक्रिया समीकरण को किसी घटक (Factor) से गुणा करें, तो साम्यावस्था स्थिरांक के लिए व्यंजक लिखते समय यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वह व्यंजक उस परिवर्ततन को भी व्यक्त करे।
अभिक्रिया
के साम्यावस्था व्यंजक को इस प्रकार लिखते हैं-
तो प्रतीप अभिक्रिया
इस प्रकार,
उत्क्रम अभिक्रिया का साम्यावस्था स्थिरांक अग्रिम अभिक्रिया के साम्यावस्था स्थिरांक के व्युत्क्रम होता है।
उपरोक्त अभिक्रिया को इस रूप में लिखने पर
साम्यावस्था स्थिरांक का मान होगा-
इस प्रकार यदि हम समीकरण 6.5 को
सारणी 6.4 एक सामान्य उत्क्रमणीय अभिक्रिया के साम्यावस्था स्थिरांकों एवं उनके गुणकों में संबंध
रासायनिक समीकरण | साम्यावस्था स्थिरांक |
---|---|
यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि
6.4 समांग साम्यावस्था
किसी समांग निकाय में सभी अभिकारक एवं उत्पाद एक समान प्रावस्था में होते हैं। उदाहरण के लिए-गैसीय अभिक्रिया
इसी प्रकार
6.4.1 गैसीय निकाय में साम्यावस्था स्थिरांक
हमने अभी तक अभिकारकों एवं उत्पादों के मोलर सांद्रण के रूप में साम्यावस्था स्थिरांक को व्यक्त किया है तथा इसे प्रतीक
आदर्श गैस-समीकरण (एकक-2) को हम इस रूप में व्यक्त करते हैं-
या
यहाँ दाब
जब
स्थिर ताप पर गैस का दाब उसके सांद्रण के समानुपाती होता है, अर्थात्
साम्यावस्था में अभिक्रिया
के लिए
अथवा
चूँकि
तथा
इसलिए
उपरोक्त उदाहरण में
अर्थात्
इस प्रकार एक समांगी गैसीय अभिक्रिया
यहाँ संतुलित रासायनिक समीकरण में
सारणी 6.5 में कुछ चयनित अभिक्रियाओं के लिए
सारणी 6.5 में कुछ चयनित अभिक्रियाओं के साम्यावस्था स्थिरांक
अभिक्रिया | ताप |
|
---|---|---|
298 | ||
400 | 41 | |
500 | ||
298 | ||
500 | ||
700 | ||
298 | 0.98 | |
400 | 47.9 | |
500 | 1700 |
साम्यावस्था स्थिरांक के मात्रक
साम्यावस्था
यदि अभिकारकों एवं उत्पादों को प्रमाणिक अवस्था में लिया जाए तो सम्यावस्था स्थिरांकों को विमाहीन (Dimensionless) मात्राओं में व्यक्त करते हैं। अभिकारकों
एवं उत्पादों को प्रामाणिक अवस्था में शुद्ध गैस की प्रामाणिक अवस्था एक bar होती है। इस प्रकार
6.5 विषमांग साम्यावस्था
एक से अधिक प्रावस्था वाले निकाय में स्थापित साम्यावस्था को ‘विषमांग साम्यावस्था’ कहा जाता है। उदाहरण के लिए-एक बंद पात्र में जल-वाष्प एवं जल-द्रव के बीच स्थापित साम्यावस्था ‘विषमांग साम्यावस्था’ है।
इस उदाहरण में एक गैस प्रावस्था तथा दूसरी द्रव प्रावस्था है। इसी तरह ठोस एवं इसके संतृप्त विलयन के बीच स्थापित साम्यावस्था भी विषमांग साम्यावस्था है। जैसे-
विषमांग साम्यावस्थाओं में अधिकतर शुद्ध ठोस या शुद्ध द्रव भाग लेते हैं। विषमांग साम्यावस्था (जिसमें शुद्ध ठोस या शुद्ध द्रव हो) के साम्यावस्था-व्यंजक को सरल बनाया जा सकता है, क्योंकि शुद्ध ठोस एवं शुद्ध द्रव का मोलर सांद्रण उनकी मात्रा पर निर्भर नहीं होता, बल्कि स्थिर होता है। दूसरे शब्दों में-साम्यावस्था पर एक पदार्थ ’
उपरोक्त समीकरण के आधार पर हम लिख सकते हैं कि
चूँकि
या
इससे स्पष्ट होता है कि एक निश्चित ताप पर
की एक निश्चित सांद्रता या दाब
इसी प्रकार निकैल, कार्बन मोनोऑक्साइड एवं निकैल कार्बोनिल के बीच स्थापित विषमांग साम्यावस्था (निकैल के शुद्धिकरण में प्रयुक्त) समीकरण -
में साम्यावस्था स्थिरांक का मान इस रूप में लिखा जाता है-
यह ध्यान रहे कि साम्यावस्था स्थापित होने के लिए शुद्ध पदार्थों की उपस्थिति आवश्यक है ( भले ही उनकी मात्रा थोड़ी हो), किंतु उनके सांद्रण या दाब, साम्यावस्था-स्थिरांक के व्यंजक में नहीं होंगे। अतः सामान्य स्थिति में शुद्ध द्रव एवं शुद्ध ठोस को साम्यावस्था-स्थिरांक के व्यंजक में नहीं लिखा जाता है। अभिक्रिया-
6.6 साम्यावस्था स्थिरांक के अनुप्रयोग
साम्यावस्था-स्थिरांक के अनुप्रयोगों पर विचार करने से पहले हम इसके निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण लक्षणों पर ध्यान दें-
क. साम्यावस्था-स्थिरांक का व्यंजक तभी उपयोगी होता है, जब अभिकारकों एवं उत्पादों की सांद्रता साम्यावस्था पर स्थिर हो जाए।
ख. साम्यावस्था-सिथरांक का मान अभिकारकों एवं उत्पादों की प्रारंभिक सांद्रता पर निर्भर नहीं करता है।
ग. स्थिरांक का मान एक संतुलित समीकरण द्वारा व्यक्त रासायनिक क्रिया के लिए निश्चित ताप पर विशिष्ट होता है, जो ताप बदलने के साथ बदलता है।
घ. उत्क्रम अभिक्रिया का साम्यावस्था-स्थिरांक अग्रवर्ती अभिक्रिया के साम्यावस्था-स्थिरांक के मान का व्युत्क्रम होता है।
ङ. किसी अभिक्रिया का साम्यावस्था-स्थिरांक
छोटे पूर्णांक से गुणा या भाग देने पर प्राप्त होता है।
अब हम साम्यावस्था स्थिरांक के अनुप्रयोगों पर विचार करेंगे तथा इसका प्रयोग निम्नलिखित बिंदुओं से संबंधित प्रश्नों के उत्तर देने में करेंगे।
- साम्यावस्था-स्थिरांक के परिमाण की सहायता से अभिक्रिया की सीमा का अनुमान लगाना।
- अभिक्रिया की दिशा का पता लगाना एवं
- साम्यावस्था-सांद्रण की गणना करना।
6.6.1 अभिक्रिया की सीमा का अनुमान लगाना
साम्यावस्था-स्थिरांक का आंकिक मान अभिक्रिया की सीमा को दर्शाता है, परंतु यह जानना महत्त्वपूर्ण है कि साम्यावस्था स्थिरांक यह नहीं बतलाता कि साम्यावस्था किस दर से प्राप्त हुई है।
साम्य मिश्रणों के संघटन से संबंधित निम्नलिखित सामान्य नियम बना सकते हैं:
यदि
(क)
(ख)
( ग)
यदि
(क)
(ख)
यदि
(क)
चित्र 6.6
(ख) इसी प्रकार एक अन्य अभिक्रिया
6.6.2 अभिक्रिया की दिशा का बोध
अभिकारक एवं उत्पादों के किसी अभिक्रिया-मिश्रण में अभिक्रिया की दिशा का पता लगाने में भी साम्यावस्था स्थिरांक का उपयोग किया जाता है। इसके लिए हम अभिक्रिया भागफल (Reaction Quotient) ’
यदि
यदि
यदि
माना कि हमने
और
(सांद्रता संकेत पर पादांक
इस प्रकार, अभिक्रिया भागफल
इस समय
अभिक्रिया-भागफल
इस प्रकार, अभिक्रिया की दिशा के संबंध में हम निम्नलिखित सामान्य धारणा बना सकते हैं-
- यदि
हो, तो नेट अभिक्रिया बाईं से दाईं ओर अग्रसरित होती है। - यदि
हो, तो नेट अभिक्रिया दाईं से बाईं ओर अग्रसरित होती है। - यदि
हो, तो नेट अभिक्रिया नहीं होती है।
चित्र : 6.7 अभिक्रिया की दिशा का बोध
6.6.3 साम्य सांद्रताओं की गणना
यदि प्रारंभिक सांद्रता ज्ञात हो, लेकिन साम्य सांद्रता ज्ञात नहीं हो, तो निम्नलिखित तीन पदों से उसे प्राप्त करेंगे-
पद 1 : अभिक्रिया के लिए संतुलित समीकरण लिखो।
पद 2 : संतुलित समीकरण के लिए एक सारणी बनाएँ, जिसमें अभिक्रिया में सत्रिहित प्रत्येक पदार्थ को सूचीबद्ध किया हो:
(क) प्रारंभिक सांद्रता
(ख) साम्यावस्था पर जाने के लिए सांद्रता में परिवर्तन और
(ग) साम्यावस्था सांद्रता
सारणी बनाने में किसी एक अभिकारक की सांद्रता को
पद
पद 4 : परिकलित मान के आधार पर साम्य सांद्रताओं की गणना करें।
पद 5 : इन्हें साम्य समीकरण में प्रतिस्थापित कर अपने परिणाम की जाँच करें।
6.7 साम्यावस्था स्थिरांक , अभिक्रिया भागफल 9 तथा गिबज़ ऊर्जा में संबंध
किसी अभिक्रिया के लिए
यदि
यदि
यदि
इस ऊष्मागतिक तथ्य की व्याख्या इस समीकरण से की जा सकती है-
जबकि
साम्यावस्था पर जब
हुए)
दोनों ओर प्रतिलघु गुणक लेने पर-
अतः समीकरण 6.23 का उपयोग कर,
यदि
को दर्शाता है अथवा अग्र दिशा में उस सीमा तक होती है जिससे कि उत्पाद आधिक्य में बने।
यदि
6.8 साम्य को प्रभावित करने वाले कारक
रासायनिक संश्लेषण के प्रमुख उद्देश्यों में से एक यह है कि न्यूनतम ऊर्जा के व्यय के साथ अभिकारकों का उत्पादों में अधिकतम परिवर्तन हो, जिसका अर्थ है- उत्पादों की अधिकतम लब्धि ताप तथा दाब की मध्यम परिस्थितियों में हो। यदि ऐसा नहीं होता है, तो प्रायोगिक परिस्थितियों में परिवर्तन
की आवश्यकता है। उदाहरणार्थ-
साम्यावस्था स्थिरांक
निम्नलिखित उपखंडों में हम साम्यावस्था पर सांद्रण, दाब, ताप एवं उत्प्रेरक के प्रभाव पर विचार करेंगे-
6.8.1 सांद्रता-परिवर्तन का प्रभाव
सामान्यतया जब किसी अभिकारक/उत्पाद को अभिक्रिया में मिलाने या निकालने से साम्यावस्था परिवर्तित होती है, तो इसका अनुमान ‘ला-शातेलिए सिद्धांत’ के आधार पर लगाया जा सकता है-
- अभिकारक/उत्पाद को मिलाने से सांद्रता पर पड़े दबाव को कम करने के लिए अभिक्रिया उस दिशा की ओर अग्रसर होती है, ताकि मिलाए गए पदार्थ का उपभोग हो सके।
- अभिकारक/उत्पाद के निष्कासन से सांद्रता पर दबाव को कम करने के लिए अभिक्रिया उस दिशा की ओर अग्रसर होती है ताकि अभिक्रिया से निकाले गए पदार्थ की पूर्ति हो सकें अन्य शब्दों में-
“जब किसी अभिक्रिया के अभिकारकों या उत्पादों में से किसी एक का भी सांद्रण साम्यावस्था पर बदल दिया जाता है, तो साम्यावस्था मिश्रण के संघटन में इस प्रकार परिवर्तन होता है कि सांद्रण परिवर्तन के कारण पड़नेवाला प्रभाव कम अथवा शून्य हो जाए।”
आइए,
चित्र
निम्नलिखित अभिक्रिया भागफल के आधार पर भी हम इसी निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं-
यदि साम्यावस्था पर
सांद्रता का प्रभाव-एक प्रयोग
इसे निम्नलिखित अभिक्रिया द्वारा प्रदर्शित किया जा सकता है-
एक परखनली में आयरन (III) नाइट्रेट विलयन का
आयन से क्रिया करके स्थायी संकुल आयन
क्योंकि
6.8.2 दाब-परिवर्तन का प्रभाव
किसी गैसीय अभिक्रिया में आयतन परिवर्तन द्वारा दाब बदलने से उत्पाद की मात्रा प्रभावित होती है। यह तभी होता है, जब अभिक्रिया को दर्शाने वाले रासायनिक समीकरण में गैसीय अभिकारकों के मोलों की संख्या तथा गैसीय उत्पादों के मोलों की संख्या में भिन्नता होती है। विषमांगी साम्य पर ला-शातेलिए सिद्धांत, के प्रयुक्त करने पर ठोसों एवं द्रवों पर दाब के परिवर्तन की उपेक्षा की जा सकती है। क्योंकि ठोस/द्रव का आयतन (एवं सांद्रता) दाब पर निर्भर नहीं करता है। निम्नलिखित अभिक्रिया में-
गैसीय अभिकर्मकों
चूँकि
6.8.3 अक्रिय गैस के योग का प्रभाव
यदि आयतन स्थिर रखते हैं और एक अक्रिय गैस (जैसेऑर्गन) जो अभिक्रिया में भाग नहीं लेती है, को मिलाते हैं तो साम्य अपरिवर्तित रहता है। क्योंकि स्थिर आयतन पर अक्रिय गैस मिलाने पर अभिक्रिया में भाग लेने वाले पदार्थ की मोलर सांद्रताओं अथवा दाबों में कोई परिवर्तन नहीं होता है। अभिक्रिया भागफल में परिवर्तन केवल तभी होता है जब मिलाई गई गैस अभिक्रिया में भाग लेने वाला अभिकारक या उत्पाद हो।
6.8.4 ताप-परिवर्तन का प्रभाव
जब कभी दाब या आयतन में परिवर्तन के कारण साम्य सांद्रता विक्षुब्ध होती है, तब साम्य मिश्रण का संघटन परिवर्तित होता है, क्योंकि अभिक्रिया भागफल (Q) साम्यावस्था स्थिरांक
- ऊष्माक्षेपी अभिक्रिया (
ॠणात्मक) का साम्यावस्था स्थिरांक तापक्रम के बढ़ने पर घटता है। - ऊष्माशेषी अभिक्रिया (
धनात्मक) का साम्यावस्था स्थिरांक तापक्रम के बढ़ने पर बढ़ता है।
तापक्रम में परिवर्तन साम्यावस्था स्थिरांक एवं अभिक्रिया के वेग में परिवर्तन लाता है।
निम्नलिखित अभिक्रिया के अनुसार अमोनिया का उत्पादन
एक उष्माक्षेपी प्रक्रम है। ‘ला-शातालिए सिद्धांत’ के अनुसार, तापक्रम बढ़ने पर साम्यावस्था बाई दिशा में स्थानान्तरित
हो जाती है एवं अमोनिया की साम्यावस्था सांद्रता कम हो जाती है। अन्य शब्दों में, कम तापक्रम अमोनिया की उच्च लब्धि के लिए उपयुक्त है, लेकिन प्रायोगिक रूप से अत्यधिक कम ताप पर अभिक्रिया की गति धीमी हो जाती है, अतः उत्प्रेरक प्रयोग में लिया जाता है।
ताप का प्रभाव - एक प्रयोग
सांद्र
(1)
हिमकारी मिश्रण समरा बीकर (270 K)
कमरे के ताप (298 K) पर जल
(3)
(363 K) पर जल
चित्र 6.9 : अभिक्रिया
साम्यावस्था पर ताप का प्रभाव एक दूसरी ऊष्माशोषी अभिक्रिया से भी समझा जा सकता है।
गुलाबी
कमरे के ताप पर
6.8.5 उत्प्रेरक का प्रभाव
उत्प्रेरक क्रियाकारकों के उत्पादों में परिवर्तन हेतु कम ऊर्जा वाला नया मार्ग उपलब्ध करवाकर अभिक्रिया के वेग को बढ़ा देता है। यह एक ही संक्रमण-अवस्था में गुजरने वाली अग्र एवं प्रतीप अभिक्रियाओं के वेग को बढ़ा देता है, जबकि साम्यावस्था को परिवर्तित नहीं करता। उत्प्रेरक अग्र एवं प्रतीप अभिक्रिया के लिए संक्रियण ऊर्जा को समान मात्रा में कम कर देता है। उत्प्रेरक अग्र एवं प्रतीप अभिक्रिया मिश्रण पर साम्यावस्था संघटन को परिवर्तित नहीं करता है। यह संतुलित समीकरण में या साम्यावस्था स्थिरांक समीकरण में प्रकट नहीं होता है।
जर्मन रसायनज्ञ फ्रीस हाबर ने दर्शाया है कि लौह उत्प्रेरक की उपस्थिति में अभिक्रिया संतोषजनक दर से होती है, जबकि
इसी प्रकार, संपर्क विधि द्वारा सल्फ्यूरिक अम्ल के निर्माण में
साम्यावस्था स्थिरांक के परिणाम के अनुसार अभिक्रिया को लगभग पूर्ण हो जाना चाहिए, किंतु
ऑक्सीकरण बहुत धीमी दर से होता है। प्लेटिनम अथवा डाइवैनेडियम पेन्टॉक्साईड
नोटः यदि किसी अभिक्रिया के साम्यावस्था स्थिरांक का मान काफी कम होता हो, तो उसमें उत्प्रेरक बहुत कम सहायता कर पाता है।
6.9 विलयन में आयनिक साम्यावस्था
साम्य की दिशा पर सांद्रता परिवर्तन के प्रभाव वाले प्रसंग में आप निम्नलिखित आयनिक साम्य के संपर्क में आए हैं-
ऐसे अनेक साम्य हैं, जिनमें केवल आयन सम्मिलित होते हैं यहाँ हम उन साम्यों का अध्ययन करेंगे। यह सर्वविदित है कि चीनी के जलीय विलयन में विद्युत् धारा प्रवाहित नहीं होती है, जबकि जल में साधारण नमक (सोडियम क्लोराइड) मिलाने पर इसमें विद्युत् धारा का प्रवाह होता है तथा लवण की सांद्रता बढ़ने के साथ विलयन की चालकता बढ़ती है। माइकल फैराडे ने पदार्थों को उनकी विद्युत् चालकता क्षमता के आधार पर दो वर्गों में वर्गीकृत किया- एक वर्ग के पदार्थ जलीय विलयन में विद्युत् धारा प्रवाहित करते हैं, ये ‘विद्युत् अपघट्य’ कहलाते हैं, जबकि दूसरे जो ऐसा नहीं करते, वैद्युत अन अपघट्य कहलाते हैं। फैराडे ने विद्युत् अपघट्यों को पुनः प्रबल एवं दुर्बल वैद्युत अपघट्यों में वर्गीकृत किया। प्रबल वैद्युत अपघट्य जल में विलेय होकर लगभग पूर्ण रूप से आयनित होते हैं, जबकि दुर्बल अपघट्य आंशिक रूप से आयनित होते हैं। उदाहरणार्थ-सोडियम क्लोराइड के जलीय विलयन में मुख्य
रूप से सोडियम आयन एवं क्लोराइड आयन पाए जाते हैं, जबकि ऐसीटिक अम्ल में एसीटेट आयन एवं हाइड्रोनियम आयन होते हैं। इसका कारण यह है कि सोडियम क्लोराइड का लगभग
6.10 अम्ल, क्षारक एवं लवण
अम्ल, क्षारक एवं लवण प्रकृति में व्यापक रूप से पाए जाते हैं। जठर रस, जिसमें हाइड्रोक्लोरिक अम्ल पाया जाता है, हमारे आमाशय द्वारा प्रचुर मात्रा (1.2-1.5 L/दिन) में स्रावित होता है। यह पाचन प्रक्रिया के लिए अति आवश्यक है। सिरके का मुख्य अवयव एसीटिक अम्ल है। नीबू एवं संतरे के रस में सिट्रिक अम्ल एवं एस्कॉर्बिक अम्ल तथा इमली में टार्टरिक अम्ल पाया जाता है। अधिकांश अम्ल स्वाद में खट्टे होते हैं, लैटिन शब्द Acidus से बना ‘एसिड’ शब्द इनके लिए प्रयुक्त होता है, जिसका अर्थ है खट्टा। अम्ल नीले लिटमस को लाल कर देते हैं तथा कुछ धातुओं से अभिक्रिया करके डाइहाइड्रोजन उत्पन्न करते हैं। इसी प्रकार क्षारक लाल लिटमस को नीला करते हैं तथा स्वाद में कड़वे और स्पर्श में साबुनी होते हैं। क्षारक का एक सामान्य उदाहरण कपड़े धोने का सोडा है, जो
फैराडे का जन्म लंदन के पास एक सीमित साधन वाले परिवार में हुआ था। 14 वर्ष की उम्र में वह एक दयालु जिल्दसाज (Book binder) के यहाँ काम सीखने लगे। उसने उन्हें उन किताबों को पढ़ने की छूट दे दी थी। जिनकी जिल्द वह बाँधता था। भाग्यवश डेवी वह (Davy) का प्रयोगशाला सहायक बन गए तथा सन् 1813-1814 में फैराडे उनके साथ महाद्वीप की यात्रा पर चले गए। उस यात्रा के दौरान वे उस समय के कई अग्रणी वैज्ञानिकों के संपर्क में आए और उनके अनुभवों से बहुत सीखा। सन् 1825 में डेवी के बाद वे रॉयल संस्थान प्रयोगशालाओं (Royal Institute Laboratories) के निदेशक बनें तथा सन् 1833 में वे रसायन शास्त्र के प्रथम फुलेरियन आचार्य (First Fullerian Professor) बने। फैराडे का पहला महत्त्वपूर्ण कार्य-विश्लेषण रसायन में था। सन् 1821 के बाद उनका अधिकतर कार्य विद्युत् एवं चुंबकत्व तथा अन्य वैद्युत
(1791-1867)
चुम्बकत्व सिद्धांतों से संबंधित थे। उन्हीं के विचारों के आधार पर ‘आधुनिक क्षेत्र सिद्धांत’ का प्रतिपादन हुआ। सन् 1834 में उन्होंने विद्युत् अपघटन से संबंधित दो नियमों की खोज की। फैराडे एक बहुत ही अच्छे एवं दयालु प्रकृति के व्यक्ति थे उन्होंने सभी सम्मानों को लेने से इंकार कर दिया। वे सभी वैज्ञानिक विवादों से दूर रहे। वे हमेशा अकेले काम करना पसंद करते थे। उन्होंने कभी भी सहायक नहीं रखा। उन्होंने विज्ञान को भिन्न-भित्र तरीकों से प्रसारित (Disseminated) किया, जिसमें उनके द्वारा रॉयल संस्थान में प्रारंभ की गई प्रत्येक शुक्रवार के शाम की भाषणमाला सम्मिलित है। ‘मोमबत्ती के रासायनिक इतिहास’ विषय पर अपने क्रिसमस व्याख्यान के लिए वे प्रख्यात थे। उन्होंने लगभग 450 वैज्ञानिक शोधपत्र प्रकाशित किए।
धुलाई के लिए प्रयुक्त होता है। जब अम्ल एवं क्षारक को सही अनुपात में मिलाते हैं, तो वे आपस में अभिक्रिया कर के लवण देते हैं। लवणों के कुछ सामान्य उदाहरण सोडियम क्लोराइड, बेरियम सल्फेट, सोडियम नाइट्रेट आदि है। सोडियम क्लोराइड (साधारण नमक) हमारे भोजन का एक मुख्य घटक है, जो हाइड्रोक्लोरिक अम्ल एवं सोडियम हाइड्रॉक्साइड की क्रिया से प्राप्त होता है। यह ठोस अवस्था में पाया जाता है, जिसमें धनावेशित सोडियम तथा ऋणावेशित क्लोराइड आयन आपस में विपरीत आवेशित स्पीशीज़ के मध्य स्थिर वैद्युत आकर्षण के कारण गुच्छे बना लेते हैं। दो आवेशों के मध्य स्थिर वैद्युत बल माध्यम के परावैद्युतांक के व्युत्क्रमानुपाती होता है। जल सार्वत्रिक विलायक है, जिसका परावैद्युतांक 80 है। इस प्रकार जब सोडियम क्लोराइड को जल में घोला जाता है, तब आयनों के मध्य स्थित वैद्युत आकर्षण बल 80 के गुणक में दुर्बल हो जाते है, जिससे आयन विलयन में मुक्त रूप से गमन करते हैं। ये जल-अणुओं के साथ जलयोजित होकर पृथक् हो जाते हैं।
चित्र 6.10 जल में सोडियम क्लोराइड का वियोजन।
जल में हाइड्रोक्लोरिक अम्ल के आयनन की तुलना ऐसीटिक अम्ल के आयनन से करने पर हमें ज्ञात होता है कि यद्यपि दोनों ही ध्रुवी अणु हैं, फिर भी हाइड्रोक्लोरिक अम्ल अपने अवयवी आयनों में पूर्ण रूप से आयनित होता है, परंतु ऐसीटिक अम्ल आंशिक रूप से
6.10.1 अम्ल तथा क्षारक की आरेनियस धारणा-
आरेनियस के सिद्धांतानुसार अम्ल वे पदार्थ हैं, जो जल में अपघटित होकर हाइड्रोजन आयन
या
एक मुक्त प्रोट्रॉन,
इसी प्रकार
हाइड्रोनियम एवं हाइड्रॉक्सिल आयन
हाइड्रोजन आयन, जो स्वयं एक प्रोटॉन है, बहुत छोटा (व्यास
आरेनियस का जन्म स्वीडन में उपसाला के निकट हुआ था। सन् 1884 में उन्होंने उपसाला विश्वविद्यालय में विद्युत् अपघट्य विलयन की चालकताओं पर शोध ग्रंथ (Thesis) प्रस्तुत किया। अगले 5 वर्षों तक उन्होंने बहुत यात्राएँ कीं तथा यूरोप के शोध केंद्रों पर गए। सन् 1895 में वे नव स्थापित स्टॉकहोम विश्वविद्यालय में भौतिकी के आचार्य पद पर नियुक्त किए गए सन् 1897 से 1902 तक वे इसके रेक्टर भी रहे। सन् 1905 से अपनी मृत्यु तक वे स्टॉकहोम के नोबेल संस्थान में भौतिकी रसायन के निदेशक पद पर काम करते रहे। वे कई वर्षों तक विद्युत्-अपघट्य विलयनों पर काम करते रहे। 1899 में उन्होंने एक समीकरण, जो आज सामान्यतः आरेनियस समीकरण, कहलाता है, के आधार पर अभिक्रिया-दर की ताप पर निर्भरता का वर्णन किया।
उन्होंने कई क्षेत्रों में काम किया। प्रतिरक्षा रसायन (Immuno Chemistry), ब्रह्मांड विज्ञान (Cosmology), जीवन का स्रोत (Origin In Life) तथा हिम-युग के कारण (Cause Of Ice Age) संबंधी क्षेत्रों में उनका महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। वे ऐसे प्रथम व्यक्ति थे, जिन्होंने ‘ग्रीन हाउस प्रभाव’ को यह नाम देकर इसकी विवेचना की। सन् 1903 में विद्युत्-अपघट्यों के विघटन के सिद्धांत एवं रसायन विज्ञान के विकास में इसकी उपयोगिता पर उन्हें रसायन विज्ञान का नोबेल पुरस्कार मिला।
विलयन में निम्नलिखित समीकरण के अनुसार आयनित होता है-
हाइड्रोक्सिल आयन भी जलीय विलयन में जलयोजित रूप से रहता है ( बॉक्स देखें)। परंतु आरेनियस की अम्ल-क्षारक धारणा की अनेक सीमाएँ हैं। यह केवल पदार्थों के जलीय विलयन पर ही लागू होती है। यह अमोनिया जैसे पदार्थों के क्षारीय गुणों की स्पष्ट नहीं कर पाती है, जिनमें हाइड्रॉक्सिल समूह नहीं है।
6.10.2 ब्रन्टेद लोरी अम्ल एवं क्षारक
डेनिश रसायनज्ञ जोहान्स ब्रन्सेद (1874-1936) तथा अंग्रेज रसायनज्ञ थॉमस एम. लोरी (1874-1936) ने अम्लों एवं क्षारकों की एक अधिक व्यापक परिभाषा दी। ब्रान्स्टेद-लोरी सिद्धांत के अनुसार वे पदार्थ, जो विलयन में प्रोटॉन
हैं।
संक्षेप में अम्ल प्रोटॉनदाता तथा क्षारक प्रोटॉन ग्राही
यहाँ हम
हाइड्रॉक्सिल आयनों की उपस्थिति के कारण क्षारीय विलयन बनता है। उपरोक्त अभिक्रिया में जल प्रोटॉन दाता है तथा अमोनिया प्रोटॉनग्राही है। इसलिए इन्हें क्रमशः ब्रन्टेद अम्ल तथा क्षारक कहते हैं। उत्क्रम अभिक्रिया में प्रोटॉन
जल में हाइड्रोक्लोरिक अम्ल के अन्य उदाहरण पर विचार करें।
उपरोक्त समीकरण से देखा जा सकता है कि जल भी एक क्षारक की भाँति व्यवहार करता है, क्योंकि यह प्रोटॉन ग्रहण करता है। जब जल
यह रोचक तथ्य है कि जल एक अम्ल तथा एक क्षारक की तरह दोहरी भूमिका दर्शाता है।
6.10.3 लूइस अम्ल एवं क्षारक
जी.एन. लूइस ने सन् 1923 में अम्ल को ‘इलेक्ट्रॉनयुग्मग्राही’ तथा क्षारक को ‘इलेक्ट्रॉन युग्मदाता’ के रूप में पारिभाषित किया। जहाँ तक क्षारकों का प्रश्न है, ब्रन्स्टेद-लोरी क्षारक तथा लूइस क्षारक में कोई विशेष अंतर नहीं है, क्योंकि दोनों ही सिद्धांतों में क्षारक एकाकी इलेक्ट्रॉन युग्म देता है, परंतु लूइस अम्ल सिद्धांत के अनुसार, बहुत से ऐसे पदार्थ भी अम्ल हैं, जिनमें प्रोटॉन नहीं है। कम इलेक्ट्रॉन वाले
इलेक्ट्रॉन क्षुद्र स्पीशीज़, जैसे
6.11 अम्लों एवं क्षारकों का आयनन
अधिकतर रासायनिक एवं जैविक अभिक्रियाएं जलीय माध्यम में होती हैं। इन्हें समझने के लिए आर्रेनियस की परिभाषा के अनुसार अम्लों एवं क्षारकों के आयनन की विवेचना उपयोगी होगी। परक्लोरिक अम्ल
दुर्बल अम्ल HA के अम्ल-क्षार वियोजन साम्य पर विचार करें-
खंड 6.10 .2 में हमने देखा कि अम्ल (या क्षारक) वियोजन साम्य एक प्रोटॉन के अग्र एवं प्रतीप दिशा में स्थानांतरण से युक्त एक गतिक अवस्था है। अब यह प्रश्न उठता है कि यदि साम्य गतिक है, तो वह समय के साथ किस दिशा में अग्रसर होगा? इसे प्रभावित करनेवाला प्रेरक बल कौन सा है? इन प्रश्नों के उत्तर देने के लिए हम वियोजन साम्य में सम्मिलित दो अम्लों (या क्षारकों) के सामर्थ्य की तुलना के संदर्भ में विचार करेंगे। उपरोक्त वर्णित अम्ल-वियोजन साम्य में उपस्थित दो अम्लों
इसके अनुसार, प्रबल अम्ल जल में पूर्णतः आयनित होता है। परिणामी क्षारक अत्यंत दुर्बल होगा, अर्थात् प्रबल अम्लों के
संयुग्मी क्षारक अत्यंत दुर्बल होते हैं। प्रबल अम्ल जैसे परक्लोरिक अम्ल
ऐसे यौगिकों का उपयोग अम्ल क्षार अनुमापन में सूचकों के रूप में
6.11.1 जल का आयनन स्थिरांक एवं इसका आयनिक गुणनफल
हमने खंड 6.10 .2 में यह देखा कि कुछ पदार्थ (जैसे जल) अपने विशिष्ट गुणों के कारण अम्ल एवं क्षारक- दोनों की तरह व्यवहार कर सकते हैं। अम्ल HA की उपस्थिति में यह प्रोटॉन ग्रहण करता है एवं क्षारक की तरह व्यवहार करता है, जबकि क्षारक
वियोजन स्थिरांक को हम इस तरह प्रदर्शित करते हैं-
जल की सांद्रता को हर से हटा देते हैं, क्योंकि इसकी सांद्रता स्थिर रहती है।
हाइड्रॉक्सिल आयनों की सांद्रता,
इस प्रकार,
शुद्ध जल का घनत्व
इस प्रकार, वियोजित एवं अवियोजित योजित जल का अनुपात-
(इस प्रकार साम्य मुख्यतः अवियोजित जल के अणुओं की ओर रहता है।)
अम्लीय, क्षारीय और उदासीन जलीय विलयनों को
अम्लीय :
उदासीन :
क्षारीय :
स्केल
हाइड्रोनियम आयन की मोलरता में सांद्रता को एक लघुगुणकीय मापक्रम (Logarithmic Scale) में सरलता से प्रदर्शित किया जाता है, जिसे
हाइड्रोजन आयन की सक्रियता
निम्नलिखित समीकरण
इस प्रकार
यदि कोई जलीय विलयन अम्लीय है, तो उसका
इस प्रकार,
अम्लीय विलयन की
क्षारीय विलयन की
उदासीन विलयन की
अब
समीकरण के दोनों ओर का ऋणात्मक लघुगुणक लेने पर:
ध्यान देने योग्य बात यह है कि यद्यपि
जैविक एवं प्रसाधन-संबंधी अनुप्रयोगों में विलयन के
चित्र 6.11: समान
उच्च यथार्थता के लिए
6.11.3 दुर्बल अम्लों के आयनन स्थिरांक
आइए, जलीय विलयन में आंशिक रूप से आयनित एक दुर्बल अम्ल HX पर विचार करें। निम्नलिखित समीकरणों में से किसी भी समीकरण द्वारा अवियोजित
प्रारंभिक सांद्रता
माना
सांद्रता में परिवर्तन (M)
सारणी 6.5 कुछ सामान्य पदार्थों की
द्रव के नाम | द्रव के नाम | ||
---|---|---|---|
काली कॉफी | 5.0 | ||
13 | टमाटर का रस | ||
चूने का पानी | 10.5 | मृदु पेय पदार्थ तथा सिरका | |
मिल्क ऑफ मैग्नीशिया | 10 | नीबू-पानी | |
अंडे का सफेद भाग, समुद्री जल | 7.8 | जठर-रस | |
मानव-रुधिर | 7.4 | ||
दूध | 6.8 | सांद्र |
|
मानव-श्लेष्मा | 6.4 |
साम्य सांद्रता (M)
जहाँ
इन संकेतकों का उपयोग कर के हम उपर्युक्त अम्ल वियोजन साम्य के लिए साम्यावस्था स्थिरांक व्युत्पन्न कर सकते हैं।
किसी निश्चित ताप पर
कुछ चुने हुए अम्लों के आयनन-स्थिरांक सारणी 6.6 में दिए गए हैं।
हाइड्रोजन आयन सांद्रता के लिए
इस प्रकार,
अम्ल के आयनन स्थिरांक
सारणी
अम्ल | आयनन स्थिरांक (Ka) |
---|---|
हाइड्रोफ्लुरिक अम्ल |
|
नाइट्रस अम्ल |
|
फार्मिक अम्ल |
|
नियासीन |
|
ऐसीटिक अम्ल |
|
बेन्जोइक अम्ल |
|
हाइपोक्लोरस अम्ल |
|
हाइड्रोसायनिक अम्ल |
|
फीनॉल |
दुर्बल वैद्युत्अपघट्य की
प**द-1 **वियोजन से पूर्व उपस्थित स्पीशीज़ को ब्रॅन्सेद लोरी अम्ल/क्षारक के रूप में ज्ञात किया जाता है।
पद-2 सभी संभावित अभिक्रियाओं के लिए संतुलित समीकरण लिखे जाते हैं, जैसे-स्पीशीज़, जो अम्ल एवं क्षारक दोनों के रूप में कार्य करती है।
पद-3 उच्च
पद-4 प्राथमिक अभिक्रिया की सभी स्पीशीज़ के निम्न मानों को सारणी के रूप में सूचीबद्ध किया जाता है-
(क) प्रारंभिक सांद्रता, c
(ख) साम्य की ओर अग्रसर होने पर आयनन की मात्रा
(ग) साम्य सांद्रता
पद-5 मुख्य अभिक्रिया के लिए साम्यावस्था स्थिरांक समीकरण में साम्य सांद्रताओं को रखकर
पद-6 मुख्य अभिक्रिया की स्पीशीज़ की सांद्रता की गणना करते हैं।
पद-7
उपर्युक्त विधि को इस उदाहरण से समझाया गया है-
6.11.4 दुर्बल क्षारकों का आयनन
क्षारक
अम्ल आयनन साम्यावस्था की तरह दुर्बल क्षारक
विकल्पत: यदि
जब साम्यावस्था प्राप्त होती है, तब साम्य स्थिरांक निम्नलिखित रूप से लिखा जा सकता है-
कुछ चुने हुए क्षारकों के आयनन-स्थिरांक
सारणी
क्षारक | |
---|---|
डाइमेथिलऐमिन |
|
ट्राइएथिलऐमिन |
|
अमोनिया |
|
क्विनीन |
|
पिरीडीन |
|
ऐनिलीन |
|
यूरिया |
कई कार्बनिक यौगिक ऐमीन्स की तरह दुर्बल क्षारक हैं। ऐमीन्स अमोनिया के व्युत्पन्न हैं, जिनमें एक या अधिक हाइड्रोजन परमाणु अन्य समूहों द्वारा प्रतिस्थापित होते हैं। जैसेमेथिलऐमीन, कोडीन, क्विनीन तथा निकोटिन, सभी बहुत दुर्बल क्षारक हैं। इसलिए इनके
हाइड्रोजन आयन सांद्रता हेतु
6.11.5 तथा में संबंध
इस अभ्यास में हम पढ़ चुके हैं कि
इसे इस सामान्यीकरण द्वारा बताया जा सकता है- दो या ज्यादा अभिक्रियाओं को जोड़ने पर उनकी नेट या अभिक्रिया का साम्यावस्था-स्थिरांक प्रत्येक अभिक्रिया वे साम्यावस्था-स्थिरांक के गुणनफल के बराबर होता है।
इसी प्रकार संयुग्मी क्षार युग्म के लिए
यदि एक का मान ज्ञात हो, तो अन्य को ज्ञात किया जा सकता है। यह ध्यान देना चाहिए कि प्रबल अम्ल का संयुग्मी क्षार दुर्बल तथा दुर्बल अम्ल का संयुग्मी क्षार प्रबल होता है।
वैकल्पिक रूप से उपर्युक्त समीकरण
चूँकि जल की सांद्रता स्थिर रहती है, अतः इसे हर से हटा दिया गया है और वियोजन स्थिरांक में सम्मिलित कर दिया गया है। उपयुक्त समीकरण को
यह ध्यान देने याग्य बात है कि यदि दोनों ओर लघुगुणक लिया जाए, तो संयुग्मी अम्ल तथा क्षार के मानों को संबंधित किया जा सकता है-
6.11.6 द्वि एवं बहु क्षारकी अम्ल तथा द्वि एवं बहु अम्लीय क्षारक
ऑक्सेलिक अम्ल, सल्फ्यूरिक अम्ल एवं फास्फोरिक अम्ल आदि कुछ अम्लों में प्रति अणु एक से अधिक आयनित होने वाले प्रोटॉन होते हैं। ऐसे अम्लों को बहु-क्षारकी या पॉलिप्रोटिक अम्ल के नाम से जाना जाता है। उदाहरणार्थ-द्विक्षारकीय अम्ल
तथा संगत साम्यावस्था समीकरण निम्नलिखित है-
तथा
सारणी
अम्ल | |||
---|---|---|---|
ऑक्सेलिक अम्ल | |||
एस्कार्बिक अम्ल | |||
सल्फ्यूरस अम्ल | |||
सल्फ्यूरिक अम्ल | अत्यधिक | ||
कार्बोनिक अम्ल | |||
साइट्रिक अम्ल | |||
फास्फोरिक अम्ल |
इस प्रकार देखा जा सकता है कि बहु प्रोटिक अम्ल के उच्च कोटि के आयनन
बहु प्रोटिक अम्ल विलयन में अम्लों का मिश्रण होता है
6.11.7 अम्ल-सामर्थ्य को प्रभावित करनेवाले कारक
अम्ल तथा क्षारकों की मात्रात्मक सामर्थ्य की विवेचना के पश्चात् हम किसी दिए हुए अम्ल को
परंतु यह ध्यान देने योग्य बात यह है कि जब तत्त्व
इसी प्रकार
परंतु जब हम आवर्त सारणी के एक ही आवर्त के तत्त्वों की विवेचना करते हैं तो
6.11.8 अम्लों एवं क्षारकों के आयनन में सम आयन प्रभाव
आइए, ऐसीटिक अम्ल का उदाहरण लें, जिसका वियोजन इस साम्यावस्था द्वारा प्रदर्शित किया जा सकता है-
ऐसीटिक अम्ल के विलयन में ऐसीटेट आयन को मिलाने पर हाइड्रोजन आयनों की सांद्रता घटती है। इसी प्रकार यदि बाह्य स्रोत से
अतः हम कह सकते हैं कि सम आयन प्रभाव ला-शातेलिये सिद्धांत पर आधारित है, जिसे हम खंड 6.8 में पढ़ चुके हैं।
प्रारंभिक सांद्रता (M)
0.05
यदि
साम्य सांद्रता (M)
इस प्रकार
दुर्बल अम्ल के लिए
अतः
6.11.9 लवणों का जल-अपघटन एवं इनके विलयन का
अम्लों तथा क्षारकों के निश्चित अनुपात में अभिक्रिया द्वारा बनाए गए लवणों का जल में आयनन होता है। आयनन द्वारा बने धनायन, ॠणायन जलीय विलयन में जलयोजित होते हैं या जल से अभिक्रिया करके अपनी प्रकृति के अनुसार अम्ल या क्षार का पुर्नरूत्पादन करते हैं। जल तथा धनायन अथवा ऋणायन या दोनों से होने वाली अन्योन्य प्रक्रिया को ‘जल-अपघटन’ कहते हैं। इस अन्योन्य क्रिया से
अब हम निम्नलिखित लवणों के जल-अपघटन पर विचार करते हैं:
(i) दुर्बल अम्लों एवं प्रबल क्षारकों के लवण, उदाहरणार्थ-
(ii) प्रबल अम्लों एवं दुर्बल क्षारकों के लवण, उदाहरणार्थ-
(iii) दुर्बल अम्लों एवं दुर्बल क्षारकों के लवण, उदाहरणार्थ-
प्रथम उदाहरण में
इस प्रकार बने ऐसीटेट आयन जल के साथ जल अपघटित होकर ऐसीटिक अम्ल तथा
ऐसीटिक अम्ल एक दुर्बल अम्ल है
इसी प्रकार दुर्बल क्षारक
अमोनियम आयनों का जल अपघटन होने से
अमोनियम हाइड्रॉक्साइड
दुर्बल अम्ल तथा दुर्बल क्षारक द्वारा बनाए गए लवण
विस्तार से गणना किए बिना कहा जा सकता है कि जल-अपघटन की मात्रा विलयन की सांद्रता से स्वतंत्र होती है। अतः विलयन का
विलयन का
6.12 बफ़र-विलयन
शरीर में उपस्थित कई तरल (उदाहरणार्थ-रक्त या मूत्र) के निश्चित
6.12.1. बफ़र विलयन बनाना
अम्लीय-बफ़र बनाना
अम्लीय
इसके लिए हम निम्नलिखित व्यंजक लिख सकते हैं-
उपरोक्त व्यंजक को पुर्नव्यवस्थित करने पर
दोनों ओर का लघुगणक लेने के बाद पदों को पुनर्व्यवस्थित करने पर हमें प्राप्त होता है-
अथवा
व्यंजक (6.40) हेन्डर्सन-हासेलबल्ख समीकरण कहलाता है।
यदि समीकरण (6.39) में,
दुर्बल क्षारक और इसके संयुग्मित अम्ल से बने बफ़र का ऐसा ही विश्लेषण निम्नलिखित परिणाम देगा,
बफ़र विलयन के
हमें ज्ञात है कि
यदि क्षारक और इसके संयुग्मित अम्ल (धनायन) की सांद्रता बराबर हो तो बफ़र विलयन का
बफ़र विलयन के
6.13 अल्पविलेय लवणों की विलेयता साम्यावस्था
हमें ज्ञात है कि जल में आयनिक ठोसों की विलेयता में बहुत अंतर रहता है। इनमें से कुछ तो इतने अधिक विलेय (जैसे कैल्सियम क्लोराइड) हैं कि वे प्रकृति में आर्द्रताग्राही होते हैं तथा वायुमंडल से जल-वाष्प शोषित कर लेते हैं। कुछ अन्य (जैसे लीथियम फ्लुओराइड) की विलेयता इतनी कम है कि इन्हें सामान्य भाषा में ‘अविलेय’ कहते हैं। विलेयता कई बातों पर निर्भर करती है, जिनमें से मुख्य है, लवण की जालक ऊष्मा (Lattice Enthalpy) तथा विलयन में आयनों की विलायक एंथैल्पी है। एक लवण को विलायक में घोलने के लिए आयनों के मध्य प्रबल आकर्षण बल (जालक एंथैल्पी) से आयन-विलायक अन्योन्य क्रिया अधिक होनी चाहिए। आयनों की विलायक एंथैल्पी को विलायकीयन के रूप में निरूपित करते हैं, जो सदैव ॠणात्मक होती है। अतः विलायकीय प्रक्रिया में ऊर्जा मुक्त होती है। विलायकीयन ऊर्जा की मात्रा विलायक की प्रकृति पर निर्भर होती है। अध्रुवीय (सहसंयोजक) विलायक में विलायकीयन एंथैल्पी की मात्रा कम होती है, जो लवण की जालक ऊर्जा को पराथव (Overcome) करने में सक्षम नहीं है। परिणामस्वरूप लवण अध्रुवी विलायक में नहीं घुलता है। यदि कोई लवण एक सामान्य नियम से जल में घुल सकता है, तो इसकी विलायकीयन एंथैल्पी लवण की जालक एंथैल्पी से अधिक होनी चाहिए। प्रत्येक लवण की एक अभिलाक्षणीय विलेयता होती है, जो ताप पर निर्भर करती है। प्रत्येक लवण की अपनी विशिष्ट विलेयता होती है। यह ताप पर निर्भर करती है। हम इन लवणों को इनकी विलेयता के आधार पर तीन वर्गों में विभाजित करते हैं-
वर्ग I | विलेय | विलेयता |
---|---|---|
वर्ग II | कुछ कम विलेय | |
वर्ग III | अल्प विलेय | विलेयता |
अब हम अन्य विलेय आयनिक लवण तथा इसके संतृप्त जलीय विलयन के बीच साम्यावस्था पर विचार करेंगे।
6.13.1 विलेयता गुणनफल स्थिरांक
आइए, बेरियम सल्फेट सदृश ठोस लवण, जो इसके संतृप्त जलीय विलयन के संपर्क में है, पर विचार करें। अघुलित ठोस तथा इसके संतृप्त विलयन के आयन के मध्य साम्यावस्था को निम्नलिखित समीकरण द्वारा प्रदर्शित किया जाता है-
साम्यावस्था स्थिरांक निम्नलिखित समीकरण द्वारा प्रदर्शित किया जाता है-
शुद्ध ठोस पदार्थ की सांद्रता स्थिर होती है।
अतः
साम्यावस्था में है, के लिए बेरियम तथा सल्फेट आयनों की सांद्रताओं का गुणनफल इसके विलेयता-गुणनफल स्थिरांक के तुल्य होता है। इन दोनों आयनों की सांद्रता बेरियम सल्फेट की मोलर-विलेयता के बराबर होगी। यदि मोलर विलेयता ’
इस प्रकार बेरियम सल्फेट की मोलर-विलेयता
कोई लवण वियोजन के फलस्वरूप भिन्न-भिन्न आवेशों वाले दो या दो से अधिक ऋणायन या धनायन दे सकता है। उदाहरण के लिए- आइए, हम जिर्कोनियम फॉस्फेट
अत:
या
यदि किसी ठोस लवण, जिसका सामान्य सूत्र
तथा इसका विलेयता-गुणनफल स्थिरांक निम्नलिखित समीकरण द्वारा व्यक्त किया जाता है-
इसलिए
समीकरण में जब एक या अधिक स्पीशीज़ की सांद्रता उनकी साम्यावस्था सांद्रता नहीं होती है, तब
सारणी
लवण का नाम | सूत्र | |
---|---|---|
सिल्वर ब्रोमाइड | ||
सिल्वर कार्बोनेट | ||
सिल्वर क्रोमेट | ||
सिल्वर क्लोराइड | ||
सिल्वर सल्फेट | AgI | |
ऐलुमिनियम हाइड्रॉक्साइड | ||
बेरियम क्रोमेट | ||
बेरियम फ्लुओराइड | ||
बेरियम सल्फेट | ||
कैल्सियम कार्बोनेट | ||
कैल्सियम फ्लुओराइड | ||
कैल्सियम हाइड्रॉक्साइड | ||
कैल्सियम ऑक्सेलेट | ||
कैल्सियम सल्फेट | ||
कैडमियम हाइड्रॉक्साइड | ||
कैडमियम सल्फाइड | ||
क्रोमियम हाइड्रॉक्साइड | CdS | |
क्यूप्रस ब्रोमाइड | ||
क्यूप्रिक कार्बोनेट | ||
क्यूप्रस क्लोराइड | ||
क्यूप्रिक हाइड्रॉक्साइड | ||
क्यूप्रस आयोडाइड | ||
क्यूप्रिक सल्फाइड | CuI | |
फेरस कार्बोनेट | CuS | |
फेरस हाइड्रॉक्साइड | ||
फेरिक हाइड्रॉक्साइड | ||
फेरस सल्फाइड | ||
मरक्यूरस ब्रोमाइड | ||
मरक्यूरस क्लोराइड | ||
मरक्यूरस आयोडाइड | ||
मरक्यूरस सल्फेट | ||
मरक्यूरिक सल्फाइड | ||
मैग्नीशियम कार्बोनेट | HgS | |
मैग्नीशियम फ्लओराइड | ||
मैग्नीशियम हाइड्राँक्साइड | ||
मैग्नीशियम ऑक्सेलेट | ||
मैग्नीज कार्बोनेट | ||
मैग्नीज सल्फाइड | ||
मैग्नीज सल्फाइड | ||
निकैल हाइड्रॉक्साइड | ||
निकैल सल्फाइड | ||
लेड ब्रोमाइड | ||
लेड कार्बोनेट | ||
लेड क्लोराइड | ||
लेड फ्लुओराइड | ||
लेड हाइड्रॉक्साइड | ||
लेड आयोडाइड | ||
लेड सल्फेट | ||
लेड सल्फाइड | ||
स्टेनस हाइड्रॉक्साइड | ||
स्टेनस सल्फाइड | ||
स्ट्रॉन्शियम कार्बोनेट | ||
स्ट्रॉन्शियम फ्जुओराइड | ||
स्ट्रॉन्शियम सल्फेट | ||
थैलस ब्रोमाइड | ||
थैलस क्लोराइड | ||
थैलस आयोडाइड | TII | |
जिंक कार्बोनेट | ||
जिक हाइड्रांक्साइड | ||
जिंक सल्फाइड |
6.13.2 आयनिक लवणों की विलेयता पर सम आयन प्रभाव
ला-शातलिए सिद्धांत के अनुसार, यह आशा की जाती है कि यदि किसी लवण विलयन में किसी एक आयन की सांद्रता बढ़ाने पर आयन अपने विपरीत आवेश के आयन के साथ संयोग करेगा तथा विलयन से कुछ लवण तब तक अवक्षेपित होगा, जब तक एक बार पुन:
दुर्बल अम्ल के लवणों की विलेयता कम
दोनों तरफ का व्युत्क्रम लेकर 1 जोड़ने पर हमें प्राप्त होगा
पुन: व्युत्क्रम लेने पर हमें प्राप्त होगा
अत:
सारांश
यदि द्रव से निकलनेवाले अणुओं की संख्या वाष्प से द्रव में लौटनेवाले अणुओं की संख्या के बराबर हो, तो साम्य स्थापित हो जाता है। यह गतिशील प्रकृति का होता है। साम्यावस्था भौतिक एवं रासायनिक, दोनों प्रक्रमों द्वारा स्थापित हो सकती है। इस अवस्था में अग्र एवं पश्च अभिक्रिया की दर समान होती है। उत्पादों की सांद्रता को अभिकारकों की सांद्रता से भाग देने पर हम प्रत्येक पद को रससमीकरणमितीय स्थिरांक के घात के रूप में साम्य स्थिरांक
अभिक्रिया
नियत ताप पर साम्यावस्था स्थिरांक का मान नियत रहता है। इस अवस्था में सभी स्थूल गुण जैसे सांद्रता, दाब आदि स्थिर रहते हैं। गैसीय अभिक्रिया के लिए साम्यावस्था स्थिरांक को
वे सभी पदार्थ, जो जलीय विलयन में विद्युत् का चालन करते हैं, ‘विद्युत् अपघट्य’ कहलाते हैं। अम्ल, क्षारक तथा लवण ‘विद्युत् अपघट्य’ हैं। ये जलीय विलयन में वियोजन या आयनन द्वारा धनायन एवं ऋणायन के उत्पादन के कारण विद्युत् का चालन करते हैं। प्रबल विद्युत् अपघट्य पूर्णतः वियोजित हो जाते हैं। दुर्बल विद्युत् अपघट्य में आयनित एवं अनायनित अणुओं के मध्य साम्य होता है। आरेनियस के अनुसार, जलीय विलयन में अम्ल, हाइड्रोजन आयन तथा क्षारक, हाइड्रॉक्सिल आयन देते हैं। संगत संयुग्मी अम्ल देता है। दूसरी ओर ब्रान्सटेड-लोरी ने अम्ल को प्रोटॉनदाता के कप में एवं क्षारक प्रोटॉनग्राही के कप में परिभाषित किया। जब एक ब्रान्स्टेड-लोरी अम्ल एक क्षारक से अभिक्रिया करता है, तब यह इसका संगत संयुग्मी क्षारक एवं क्रिया करने वाले क्षारक के संगत संयुग्मी अम्ल को बनाता है। इस प्रकार संयुग्मी अम्ल-क्षार में केवल एक प्रोटॉन का अंतर होता है। आगे, लूइस ने अम्ल को सामान्य रूप में इलेक्ट्रॉन युग्मग्राही एवं क्षारक को इलेक्ट्रॉन युग्मदाता के रूप में परिभाषित किया। आरेनियस की परिभाषा के अनुसार, दुर्बल अम्ल के वियोजन के लिए स्थिरांक
विद्यार्थियों के लिए इस एकक से संबंधित निर्देशित क्रियाएँ
(क) विद्यार्थी विभित्र ताजा फलों एवं सब्जियों के रसों, मृदु पेय, शरीर पदार्थों द्रवों एवं उपलब्ध जल के नमूनों का
(ख)
(ग) वे सोडियम एसीटेट एवं एसीटिक अम्ल को मिश्रित कर कुछ बफर विलयन बना सकते हैं एवं
(घ) उन्हें विभित्र
(ङ) सूचकों का उपयोग कर कुछ अम्ल क्षार अनुमापन कर सकते हैं।
(च) वे अल्प विलेय लवणों की विलेयता पर सम आयन प्रभाव को देख सकते हैं।
(छ) यदि विद्यालय में